
रविवार, 31 अक्टूबर 2010
छत्तीसगढ़ का गुप्त प्रयाग, शिवरीनारायण

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010
छत्तीसगढ़ की काषी खरौद

जिला मुख्यालय जांजगीर से 55 किमी और बिलासपुर रेलवे जंक्षन से 65 किमी दूर बसे इस धार्मिक नगरी खरौद की पहचान तालाबों की नगरी के रूप में भी होती है। लक्ष्मणेष्वर की नगरी में 126 तालाब हैं, जिससे छत्तीसगढ़ी में बुजुर्गों द्वारा छह आगर छह कोरी कहा जाता है। खरौद में यह देखने में आता है कि जिस ओर नजरें घुमाएं, उस ओर तालाब जरूर दिखता है। साथ ही इन तालाबों के किनारे मंदिर बना हुआ दिखता है। खरौद के नामकरण को खरदूषण राजा से भी जोड़ा जाता है, वैसे पुराविद, खरौद में षैव परंपरा होने की बात कहते हैं। बदलते समय के साथ और मंदिरों का जीर्णोद्धार नहीं होने से कई मंदिर जहां खंडित हो गए हैं तो कई तालाब भी अब इतिहास बन चुके हैं। फिर भी खरौद में पुरातात्विक धरोहरों के कई अजूबे पहचान कायम है, जिसे देखने श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। खरौद में महाषिवरात्रि पर लगने वाला सबसे बड़ा मेला पूरे छत्तीसगढ़ में विख्यात है और इस दिन लक्ष्मणेष्वर धाम में भक्तों का रेला उमड़ता है। मंदिर का पट सुबह 4 बजे खुलते ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है और भगवान के दर्षन का सिलसिला देर रात तक चलता रहता है।
खरौद वैसे अनेक मंदिरों का केन्द्र है और सबकी अपनी-अपनी अलग-अलग विरासत है। नगर में स्थित भगवान लक्ष्मणेष्वर का मंदिर की महिमा अपार है और इसकी कई खासियतें हैं। 12 वीं षताब्दी में बना यह मंदिर लगभग 110 फीट चैड़ा भू-भाग में स्थित है और 30 फीट का गोलाई लिए हुआ है। महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर में स्थापित लक्ष लिंग जमीन से करीब 48 फीट उपर स्थित है। इस लक्ष लिंग में एक लाख छिद्र होना माने जाते हैं और श्रद्धालु, श्रद्धाभाव से यहां एक लाख चावल चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं। लक्षलिंग में हमेषा जल भरा रहता है और खराब भी नहीं होता, जबकि यह लक्षलिंग जमीन तल से अत्यधिक उपर है। माना जाता है कि लक्षलिंग में जो जल चढ़ाया जाता है, वह मंदिर के पिछले हिस्से में स्थित कुण्ड में चला जाता है। जिससे कुण्ड कभी सूखता नहीं है। भक्तों में आस्था है कि भगवान षिव के दर्षन मात्र से क्षय रोग दूर हो जाता है। लक्ष्मणेष्वर मंदिर के चारों ओर बड़ी दीवार बनी हुई और मंदिर के भीतर बड़ी जगह बनाई गई है, जिससे वृहदाकार निर्माण की बात पुराविद कहते हैं। मंदिर के बाहर एक कुआं स्थित है, जहां सिक्के डाले जाने की परंपरा है, यह कहा जाता है कि सिक्के के दीवार से नहीं टकराने पर षुभ होता है। भक्तों में यह भी मान्यता है कि यहां सच्चे मन से जो भी मांगा जाता है, वह पूरी होती है। इसी के चलते खरौद में महापर्व महाषिवरात्रि के अलावा सावन महीने में हर सोमवार और तेरस पर भक्तों की भीड़ देखने लायक रहती है। इन अवसरों पर दूसरे प्रदेषों से भी दर्षनार्थी भगवान लक्ष्मणेष्वर के दर्षन के लिए पहुंचते हैं। लक्ष्मणेष्वर मंदिर के अलावा खरौद में प्राचीन ईंदल देव और षबरी माता का मंदिर भी है। ईंदलदेव का मंदिर ईंट से बना है और जानकार इसे 6 वीं षताब्दी में बने होने की बात कहते हैं। ईंदलदेव मंदिर को जिले का सबसे पुरातन मंदिर माना जाता है, जिसकी दीवारों पर अनोखी कलाकृति बनाई गई है। ईंट के बने होने के कारण इतिहासविदों द्वारा हमेषा यहां षोध कार्य किया जाता है और विदेषों से भी लोग पहुंचकर यहां से जानकारी लेते हैं। पुरातत्व विभाग द्वारा प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किए जाने से मंदिर में किसी तरह निर्माण करने पर रोक है। ईंदलदेव मंदिर की जीर्ण होने की स्थिति में कुछ साल पहले पुरातत्व विभाग ने जीर्णोद्धार कराया था, इससे मंदिर को लोहे के राड से बांधा गया था। इस मंदिर की खासियत यह भी है कि इसका मुख्य द्वार पीछे की ओर और द्वार पर मां गंगे की तस्वीर उकेरी गई है। ईंदलदेव मंदिर में कई अनेक खूबियां हैं, जिसके चलते यह मंदिर पर्यटकों और पुराविदों को अपनी ओर वर्षों से आकर्षित करता आ रहा है।
षबरी मंदिर की अपनी एक पुरातात्विक पहचान अब भी कायम है। मंदिर के द्वार पर अद्धनारीष्वर की प्रतिमा स्थित है, जिसमें भगवान षिव और पार्वती की तस्वीर उकेरी गई है, जो पर्यटकों का केन्द्र बिन्दु होता है। षबरी मंदिर के कुछ हिस्से फर्षी पत्थर से बने हैं तो उपरी हिस्सा ईट से बनाया गया है। ईंट से बने होने के कारण इस मंदिर को भी देखने इतिहासविद और पुराविद पहुंचते हैं। षबरी मंदिर के षिलालेख में भी कई पुरातन ष्लोक लिखे गए हैं, जिससे खरौद नगरी के पुरातन गुणगान का पता चलता है और इन मंदिरों के दर्षनार्थ श्रद्धालु पहुंचते हैं।
फिलहाल खरौद को छत्तीसगढ़ षासन द्वारा दर्षनीय स्थल घोषित किया गया है, लेकिन जो विकास इस नगरी का होना चाहिए, वह नहीं हो सका है। मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए सामुदायिक भवन जैसी अन्य सुविधाओं की जरूरत है, मगर अब तक ऐसी कोई पहल नहीं की गई है। साथ ही नगर पंचायत द्वारा भी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया है। पुरातत्व विभाग के अधीन सभी मंदिरों के होने से निर्माण नहीं कराए जा पा रहे हैं, जबकि मंदिर में हर वर्ष चढ़ावे से लाखों रूपये की आय होती है। इस आय का अब तक कोई हिसाब नहीं रखा गया है और मंदिर की पूजा-अर्चना कार्य में लगे पुजारी ही इन राषियों को आपस में बांट लेते हैं। वैसे यहां ट्रस्ट बनाने की मांग समय-समय पर उठती रही है, किन्त यह पहल भी अधूरी है।
बुधवार, 27 अक्टूबर 2010
पहाड़ का सीना चीर, अनवरत बह रही धारा
जांजगीर-चांपा जिले के तुर्रीधाम ऐसा ही एक धार्मिक स्थल है, जहां पहाड़ का सीना चीरकर जल की धारा बरसों से अनवरत बह रही है। यह अद्भुत नजारा देखकर दर्षन के लिए पहुंचने वाले दर्षनार्थी एकबारगी दंग रह जाते हैं कि आखिर पहाड़ के भीतर से किस तरह जल की धारा बह रही है। तुर्रीधाम में हर बरस सात दिनों का मेला लगता है, जहां छत्तीसगढ़ समेत उड़ीसा से भी लोग आते हैं। सावन महीने में तो भक्तों का रेला मंदिर में देखने लायक रहता है। यहां पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु दर्षनार्थ पहुंचते हैं। जिला मुख्यालय जांजगीर से 30 किमी दूर सक्ती क्षेत्र के तुर्रीगांव में भगवान षिव का मंदिर स्थित है। यह नगरी तुर्रीधाम के नाम से विख्यात है। ऋषभतीर्थ से षुरू हुई जलधारा आगे चलकर करवाल नाले में तब्दील हो जाती है, जहां से कलकल करती धारा बहती है। इस नाले की खासियत यह भी है कि मंदिर के समीप हमेषा जल भरा रहता है और पानी की धार अनवरत बहती रहती है। इस धार्मिक नगरी में स्थित भगवान षिव मंदिर के पिछले हिस्से से जल की धारा हर समय बहती है, चाहे गर्मी हो या फिर बरसात। तुर्रीगांव के रहवासियों का तो यहां तक कहना है कि गर्मियों में पहाड़ से निकलने वाली जल की धारा और तेज हो जाती है। वह धारा मंदिर के नीचले हिस्से से होते हुए करवाल नाला में जाकर मिल जाती है, जबकि भगवान षिव का मंदिर पहाड़ से सैकड़ों फीट नीचे बना है। जानकारों का कहना है कि मंदिर में स्थापित लिंग भी नीचे है और नीचे जाने के लिए सीढ़ी का निर्माण किया गया है। इस निर्माण को भूमिज षैली का नाम दिया गया है। तुर्रीधाम में मंदिर का निर्माण जैसा हुआ है और जिस तरह से पहाड़ से जल की धारा बह रही है, कुछ ऐसी ही स्थिति मध्यप्रदेष के चित्रकोट स्थित हनुमान पहाड़ में है, जहां भूमिगत जल बहता है। यहां भी लोग यह नहीं जान पाए हैं कि पहाड़ के उपर कहां से जल की धारा बहना षुरू हुई है। वहां ऐसा जल स्त्रोत बना है, जहां हर मौसम में जल की धारा बह रही है। तुर्रीधाम में ऐसा ही नजारा हर समय देखने को मिलता है। तुर्रीधाम के ग्रामीण छत्तराम का कहना है कि पहाड़ से जल कहां से बह रहा है, वे नहीं जानते। जल की धारा पहाड़ से होते हुए करवाल नाला में जाकर मिलती है। उनका कहना है कि पहाड़ में अनेक वनौषधि रहती है। इसके चलते ग्रामीण इस जल को कीटनाषक के रूप में छिड़काव करते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात है कि पहाड़ से बह रहा जल कभी खराब नहीं होता, यह जल गंगाजल की तरह हमेषा वैसा ही रहता है। इस कारण से लोगों की श्रद्धा बढ़ती जा रही है। इस जल स्त्रोत के संबंध में किवदंति है कि तुर्रीगांव का एक चरवाहा, जानवर चराने गया था। इसी दौरान उसे भगवान षिव के दर्षन हुए। षिवजी ने उसे वर मांगने को कहा तो चरवाहा ने कहा कि मुझे धन-दौलत, सोने-चांदी, हीरे-जेवरात नहीं चाहिए, गांव में हमेषा पानी की किल्लत बनी रहती है। आप कृपया करके इस समस्या से छुटकारा दिलाइए और ऐसा कुछ कीजिए कि बारहों महीने यहां जल उपलब्ध रहे। गांव के बुजुर्गों के अनुसार तब से तुर्रीधाम में चट्टान से पानी अनवरत बह रहा है और गांव में कभी भी पानी की दिक्कतें नहीं हुई है। भीषण गर्मी में भी कोई परेषानी सामने नहीं आती। उस चरवाहे के वंषज अब भी गांव में निवास करते हैं। समय के बदलते चक्र के साथ यहां मंदिरों का निर्माण होता चला गया और यह एक धाम के रूप में स्थापित हो गया। पुरातत्व के जानकार एवं जिला पुरातत्व समिति के सदस्य प्रो। अष्विनी केषरवानी का कहना है कि तुर्रीधाम, करवाला नाला के तट पर बसा है, जहां श्रद्धालु भगवान षिव के दर्षन के लिए आते हैं। हर वर्ष लगने वाले मेले में लोगों की भीड़ उमड़ती है। अनेक विषेषताओं के कारण तुर्रीधाम के प्रति लोगों की आस्था दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। मंदिर के उपर तट पर स्थित पहाड़ से अनवरत जल की धारा बरसों से बह रही है, जो रमणीय है और षोध का विषय है कि आखिर ऐसा क्यों और किस कारण से हो रहा है। गर्मी के दिनों में धारा और तेज होने को लेकर भी पुरातत्व के जानकारों को कार्य किए जाने की जरूरत बनी हुई है।
मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
हरियाली की रखवाली मां के हाथ में

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
नैला में विराजीं धन दुर्गा

समिति द्वारा पिछले साल १०-१० रूपये के सिक्के जड़कर माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाई गई थी। इस दौरान भी लोगों की आस्था उमड़ी थी। उससे पहले समिति के सदस्यों ने शिप और नारियल की प्रतिमा बनवाई थी। उसे भी लोगों ने खूब पसंद किया था। इन प्रतिमाओं को कोरबा के कलाकार गोरे स्वर आकृति दी जाती है। इस साल भी बनाई गई २१ हजार चंडी के सिक्के की प्रतिमा को उन्हीं ने ही आकृति दी है।
नवरात्री के तीन दिनों तक हजारों लोगों ने चांदी के सिक्के से बनी प्रतिमा को देखने पहिंचे और सभी होते नजर आये।
सभी पर माँ दुर्गा की कृपा बनी रहे। इसी आशा के साथ
आदि शक्ति माता को प्रणाम।
बुधवार, 13 अक्टूबर 2010
सीने पर आस्था की ज्योत

रविवार, 10 अक्टूबर 2010
नारीशक्ति और नशाबंदी
समाज के विकास में आज बहुत बड़ी बाधा है तो वह है, नशाखोरी। नशा, मनुष्य का हर दृष्टी से नशा है, फिर लोग जागरूक होते नजर नहीं आ रहे हैं। यह सबसे बड़ा चिंता का विषय है। नशाखोरी की चपेट में युवा वर्ग ज्यादा आ रहे हैं। इससे निश्चित ही समाज का लगातार विघटन हो रहा है। नशाखोरी को रोकने सरकार की रूचि भी कहीं नजर नहीं आती। ऐसे में हमें लगता है, नारीशक्ति ही समाज की इस समस्या को खत्म कर सकती है। वैसे तो नारियों अबला कहा जाता है, लेकिन मेरा मन्ना है की जब नारीशक्ति जागृत हो जाती हैं तो फिर समाज में कोई भी कुरीति टिक नहीं पाती।
इस बात को सिध्ध कर नारियों ने कर दिखाया है। पिछले कुछ समय से शराबखोरी के चलते कई घर तबाह होते देखे गए हैं। इस स्थिति में अब नारी जाग गई हैं। इसी का परिणाम है की जगह-जगह शराब की वैध और अवैध बिक्री को लेकर आन्दोलन शुरू हो गए हैं। छत्तीसगढ़ के किसी न किसी इलाके में यह बात इन दिनों सुनने में आ रही है की स्व सहायता समूह समेत अन्य वर्ग की महिलाओं ने शराब बंदी के मोर्चा खोला। अभी हाल ही में रायपुर के अलग-अलग क्षेत्र की महिलाएं मुख्यमत्री डॉ रमण सिंह के जनदर्शन कार्यक्रम में शिकायत लेकर पहुंची। यहाँ मुख्यमंत्री ने महिलाओं की परेशानियों को गंभीरता से लिया और इस मामले में करवाई के निर्देश दिए। साथ ही अवैध बिक्री पर रोक लगाने की बात कही।
ऐसा माहौल पहली बार नहीं बना है, जब महिलाओं ने नशाखोरी का विरोध ना किया हो। वैसे भी नशाखोरी से सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभाविर होती हैं। ऐसे में महिलाओं की शराब के खिलाफ मोर्च खोला जाना कई मायनों में अहम् है। यह बात भी सनातन काल से कही जाती रही है की महिलाएं ही समाज सुधरने में मुख्या भूमिका निभाती रही हैं।
नशाखोरी के चलते अपराध में लगातार वृद्धि हो रहे हैं, यह बात भी प्रमाणित हो गई है। ऐसे में यदि सरकार नशाखोरी को रोकने पहल ना करे तो भला इसे क्या कहा जा सकता है। सरकार कहती है की आकारी ठेके से करोड़ों की आय होती है। हमारा कहना है की क्या लोगों के घरों तबाह करके कमाए गए रुपयों की कोई अहमियत रह जाती है। वैसे भी छत्तीसगढ़ में खनिज का अपार भण्डार है, लेकिन सरकार है की रायल्टी चोरी को रोकने कोई कदम नहीं उठती, लेकिन समाज को बर्बाद करने के लिए हर साल शराब की दूकान बढ़ाये जा रहे हैं। ऊपर से गांवों में जिस तरह से अवैध ढंग से शराब की बिकवाली होती है, उससे पूरी सरकार कटघरे में कड़ी नजर आती है। मगर अफसोस इस राज्य में विपक्ष में बैठी कांग्रेस के नेता इस मुद्दे को उठाने के बजाय मूकदर्शक बने बैठे हैं। ऐसे हालात में नारी शक्ति को ही जागरूक होकर नशाबंदी के खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी। नहीं तो अभी केवल घर तबाह हो रहे हैं, बाद में समाज का क्या स्थिति बनेगी, कहा नहीं जा सकता।
इस बात को सिध्ध कर नारियों ने कर दिखाया है। पिछले कुछ समय से शराबखोरी के चलते कई घर तबाह होते देखे गए हैं। इस स्थिति में अब नारी जाग गई हैं। इसी का परिणाम है की जगह-जगह शराब की वैध और अवैध बिक्री को लेकर आन्दोलन शुरू हो गए हैं। छत्तीसगढ़ के किसी न किसी इलाके में यह बात इन दिनों सुनने में आ रही है की स्व सहायता समूह समेत अन्य वर्ग की महिलाओं ने शराब बंदी के मोर्चा खोला। अभी हाल ही में रायपुर के अलग-अलग क्षेत्र की महिलाएं मुख्यमत्री डॉ रमण सिंह के जनदर्शन कार्यक्रम में शिकायत लेकर पहुंची। यहाँ मुख्यमंत्री ने महिलाओं की परेशानियों को गंभीरता से लिया और इस मामले में करवाई के निर्देश दिए। साथ ही अवैध बिक्री पर रोक लगाने की बात कही।
ऐसा माहौल पहली बार नहीं बना है, जब महिलाओं ने नशाखोरी का विरोध ना किया हो। वैसे भी नशाखोरी से सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभाविर होती हैं। ऐसे में महिलाओं की शराब के खिलाफ मोर्च खोला जाना कई मायनों में अहम् है। यह बात भी सनातन काल से कही जाती रही है की महिलाएं ही समाज सुधरने में मुख्या भूमिका निभाती रही हैं।
नशाखोरी के चलते अपराध में लगातार वृद्धि हो रहे हैं, यह बात भी प्रमाणित हो गई है। ऐसे में यदि सरकार नशाखोरी को रोकने पहल ना करे तो भला इसे क्या कहा जा सकता है। सरकार कहती है की आकारी ठेके से करोड़ों की आय होती है। हमारा कहना है की क्या लोगों के घरों तबाह करके कमाए गए रुपयों की कोई अहमियत रह जाती है। वैसे भी छत्तीसगढ़ में खनिज का अपार भण्डार है, लेकिन सरकार है की रायल्टी चोरी को रोकने कोई कदम नहीं उठती, लेकिन समाज को बर्बाद करने के लिए हर साल शराब की दूकान बढ़ाये जा रहे हैं। ऊपर से गांवों में जिस तरह से अवैध ढंग से शराब की बिकवाली होती है, उससे पूरी सरकार कटघरे में कड़ी नजर आती है। मगर अफसोस इस राज्य में विपक्ष में बैठी कांग्रेस के नेता इस मुद्दे को उठाने के बजाय मूकदर्शक बने बैठे हैं। ऐसे हालात में नारी शक्ति को ही जागरूक होकर नशाबंदी के खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी। नहीं तो अभी केवल घर तबाह हो रहे हैं, बाद में समाज का क्या स्थिति बनेगी, कहा नहीं जा सकता।
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