शुक्रवार, 24 जून 2011

‘राष्ट्रपति को भा गई छत्तीसगढ़ की आत्मीयता’

छत्तीसगढ़ नेधान का कटोराके तौर पर देश-दुनिया में पहचान रखी है। प्रदेश की प्राचीन संस्कृति लोककला यहां की प्रमुख विरासत है। छग में दूसरे राज्यों तथा अन्य देशों से जब भी कोई पहुंचते हैं तो वे सहसा ही यहां के लोगों की आत्मीयता से अभिभूत हो जाते हैं। वनांचल क्षेत्रों की आदिवासी संस्कृति परंपरा जानकर हर कोई वाह-वाह किए बगैर नहीं रहता और यहां की यादों को अपनी संस्मरण में उतार लेते हैं। छत्तीसगढ़ के लिए अक्सर कहा जाता है - ‘छत्तीसगढ़िया-सबसे बढ़िया यह उक्ति आज की बनाई हुई नहीं है, बल्कि बरसों से ऐसा ही छत्तीसगढ़ियों के लिए प्रचलित है। प्रदेश के रहवासियों को इसलिए ऐसा कहा जाता है, क्योंकि वे सहज, सरल होने के साथ-साथ आत्मीयता के गुणों से लबरेज माने जाते हैं। इस बात को जब भी अवसर मिलता है, तब-तब छत्तीसगढ़ियों ने साबित भी किया है। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा तो मिला हुआ है ही, साथ ही यह राज्य मेंगुरतुर गोठके तौर पर भी जानी जाती है। छत्तीसगढ़ी में इतनी मिठास है कि दूसरे राज्यों से आकर यहां रहने वाले लोग भी धीरे-धीरे इस भाषा को बोलचाल में शामिल कर लेते हैं।

इधर दो दिनी छत्तीसगढ़ के दौरे पर राजधानी रायपुर पहुंची, राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भी प्रदेश की अवाम की आत्मीयता से गदगद नजर आईं। वैसे राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल, दूसरी बार छत्तीसगढ़ के प्रवास पर आई हैं। लिहाजा, संबोधन के दौरान उनका छग तथा यहां के रहवासियों से सीधा जुड़ाव देखा गया। राजधानी की विधानसभा में बने सेंट्रल-हॉल का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि छग में वे दूसरी बार आई हैं और जिस तरह यहां की जनता में आत्मीयता है, वह काबिले तारीफ हैं। साथ ही उन्होंने छग के विकास के मामले में बढ़ते सोपान के लिए प्रदेश की जनता को बधाई दी। उन्होंने नक्सलियों को हिंसा व बंदूक की लड़ाई छोड़, मुख्यधारा में लौटने का आह्वान करते हुए, अपराध व हिंसा को समाज, राज्य तथा देश के लिए खतरनाक बताया। महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल ने कहा कि छग में लिंगानुपात, अन्य दूसरे राज्यों की अपेक्षा बेहतर है, उन्होंने बढ़ते भ्रूणहत्या को घोर अपराध करार दिया। उन्होंने कहा कि महिलाओं के उत्थान की दिशा में हर स्तर पर प्रयास होना चाहिए, इसके बगैर सामाजिक विकास संभव नहीं है। जब महिलाएं आगे बढ़ेंगी तो निश्चित ही प्रदेश व देश प्रगति करेगा और समाज विकसित होगा।
इस अवसर पर महामहिम राज्यपाल श्री शेखर दत्त, मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, विधानसभा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक, नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे समेत विधानसभा के सदस्यगण व अफसर उपस्थित थे।



न कांग्रेस की जीत, न भाजपा की
अपने प्रवास के दूसरे दिन अर्थात् 25 जून को महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल, रायपुर नगर निगम की नई बिल्डिंग को लोकार्पित करेंगी। इस तरह बिल्डिंग के लोकार्पण के बाद यह विवाद भी थम जाएगा कि आखिर भवन को किसके हाथों लोकार्पित कराया जाए ? दरअसल, नगर निगम में कांग्रेस की महापौर श्रीमती किरणमयी नायक हैं और प्रदेश में भाजपा की सरकार तथा सभापति भाजपा के हैं, ऐसे में पिछले कुछ महीनों से यह विवाद छाया रहा। कांग्रेस के लोग चाहते थे कि इस भवन का लोकार्पण, यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी या फिर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह करें, दूसरी तरफ भाजपा के लोग यह चाहते थे कि भवन का लोकार्पण राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी या फिर लालकृष्ण आडवाणी करें। हालांकि, इस विवाद का अंत बेहतर तरीके से हो रहा है, क्योंकि न तो कांग्रेस की जिद पूरी हुई और न ही, भाजपा की। यह कहना सही होगा कि निगम की नई बिल्डिंग का लोकार्पण महामहिम राष्ट्रपति के हाथों होना भी एक सुनहरा पल होगा, क्योंकि इतनी बड़ी उम्मीद किसी को न थीं। आखिर कहा भी जाता है- जो होता है, अच्छे के लिए होता है।

मंगलवार, 14 जून 2011

यहां होता है तालाब का विवाह !

- 80 बरस बाद दोहराई गई परंपरा
- केरा गांव के लोगों का अनूठा कार्य
- तालाबों के अस्तित्व को बचाने की मुहिम
- जल संरक्षण की दिशा में ग्रामीणों का अहम योगदान
- ‘जल ही जीवन है’, ‘जल है तो कल है’ का संदेश

भारतीय संस्कृति में संस्कार का अपना एक अलग ही स्थान है। सोलह संस्कारों में से एक होता है, विवाह संस्कार। देश-दुनिया में चाहे कोई भी वर्ग या समाज हो, हर किसी के अपने विवाह के तरीके होते हैं। मानव जीवन में वंश वृद्धि के लिए भी विवाह का महत्व सदियों से कायम है। इसके लिए समाज में एक दस्तूर भी तय किया गया है। ऐसे में आपको यह बताया जाए कि तालाब का भी विवाह होता है तो निश्चित ही आप चौंकेंगे ! मगर ऐसी विवाह की परंपरा को दोहराई गई है, छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के केरा गांव में, जहां 80 बरसों बाद एक बार फिर तालाब का विवाह कराया गया। सभी रीति-रिवाजों के साथ ग्रामीणों ने दो दिनों तक यहां राजापारा नाम के तालाब के विवाह संस्कार को पूर्ण कराया और इस तरह तालाबों के संरक्षण के साथ, उसके अस्तित्व को बचाने की गांव वालों की मुहिम जरूर रंग लाएगी।

दरअसल, महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत करीब 5 लाख रूपये खर्च कर केरा गांव के ‘राजापारा तालाब’ का गहरीकरण कराया गया और जल संरक्षण की दिशा में ग्रामीणों ने अहम योगदान देते हुए, एक पुरानी परंपरा के माध्यम से घटते जल स्तर को बचाने के लिए अपनी पूरी सहभागिता निभाई। इस अनूठे विवाह के बारे में जानकर कोई भी एकबारगी विश्वास नहीं कर रहा है और यही कारण है कि केरा में संपन्न हुई इस अनूठी परंपरा, समाज के लिए एक मिसाल भी साबित हो रही हैं। ‘जल ही जीवन है’, ‘जल है तो कल है’, इन सूत्र वाक्यों को जीवन में उतारते हुए हमें ‘जल’ को बचाने के लिए हर स्तर पर कोशिश करनी चाहिए। इस लिहाज से निश्चित ही केरा गांव के ग्रामीणों ने अनुकरणीय कार्य किया है।

ग्राम पंचायत केरा ( नवागढ़) के सरपंच लोकेश शुक्ला ने बताया कि आठ दशक पहले गांव के ‘बर तालाब’ में इस तरह विवाह का आयोजन किया गया था। इसके बाद यह परंपरा अभी निभाई गई है। उनका कहना है कि जब भी गांव में शुभ कार्य होता है तो ग्रामीणों द्वारा तालाब विवाह की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। यह तय नहीं है कि कब विवाह संस्कार का आयोजन होगा और इसके लिए एक ही तालाब तय नहीं रहता। पूर्वजों द्वारा ऐसी परिपाटी की शुरूआत की गई थी, उस परंपरा को अरसे बाद निभाने का मौका नई पीढ़ी को अब मिला है।

सरंपच श्री शुक्ला ने बताया कि जब उन्हें तालाब के विवाह कराने संबंधी जानकारी मिली तो वे अभिभूत हो गए और इसके लिए ग्रामीणों को हर संभव सहयोग का भरोसा दिलाया। 11 जून को कलश यात्रा के साथ विवाह संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान कलश यात्रा में बड़ी संख्या में कन्याएं, युवती व महिलाएं समेत ग्रामीण शामिल हुए। कलश कलश गांव की गलियों से घूमती हुई चंडी मां मंदिर होते हुए राजापारा तालाब पहुंची। यहां दो दिनों तक विवाह कार्यक्रम पूरे रीति-रिवाजों के साथ संपन्न कराया गया।

उन्होंने बताया कि गांव में तालाब विवाह की पुरानी परिपाटी तो है ही, साथ ही आज के दौर में घटते जल स्तर के लिहाज से भी यह इसलिए काफी महत्वपूर्ण भी है कि इस बार ‘राजापारा तालाब’ का मनरेगा के तहत गहरीकरण कराया गया है। इससे जल संवर्धन की दिशा में भी बेहतर कार्य हो रहा है। दूसरी ओर ग्रामीणों में यह भी मान्यता है कि तालाब के विवाह से गांव में जलजनित बीमारी नहीं फैलती और किसी तरह दैवीय प्रकोप का संकट नहीं होता। लोगों में इसलिए भी ‘तालाब विवाह’ के प्रति लगाव है कि 100 कन्याओं के विवाह की अपेक्षा तालाब विवाह में सहभागिता से उतने पुण्य की प्राप्ति होती है। इन्हीं सब कारण से लोगों का रूझान बढ़ा और 80 बरस बाद एक बार फिर गांव में तालाब विवाह की परंपरा दुहराई जा सकी।

वर बने ‘वरूणदेव’, वधु बनी ‘वरूणीदेवी’
केरा गांव में संपन्न हुए तालाब विवाह में वर के रूप में भगवान वरूणदेव को विराजित किया गया, वहीं वधु के रूप में वरूणीदेवी को पूजा गया। ग्रामीणों ने पूरे उत्साह से इनका विवाह रचाया और दो दिन तक चले विवाह कार्यक्रम में हर वह रस्म पूरी की गई, जो किसी व्यक्ति की शादी में निभाई जाती है। तालाब विवाह में लोगों का उत्साह देखते बना और उनका हुजूम उमड़ पड़ा। जिन्होंने इस अनूठे विवाह के बारे में जाना, वह सहसा ही खींचे चला आया।


विवाह
की साक्षी बनीं सांसद
केरा की ‘तालाब विवाह’ परंपरा की साक्षी जांजगीर-चांपा की सांसद श्रीमती कमला पाटले भी बनीं। वे यहां ग्रामीणों के उत्साह बढ़ाने विशेष तौर पर उपस्थित रहीं। इस दौरान उन्होंने कहा कि ग्रामीणों का प्रयास काबिले तारीफ है, क्योंकि एक तरफ दिनों-दिन जल स्तर घट रहा है तथा पुराने तालाबों का अस्तित्व मिट रहा है। ऐसे में तालाब संरक्षण कार्य के दृष्टिकोण से लुप्त होती परंपरा भी समाज को संदेश देती है। इस शुभ आयोजन में पहुंचना ही अपने आप में बड़ी बात है, क्योंकि जल के बिना कोई भी जीव-जंतु जीवित नहीं रह सकता।

शनिवार, 26 मार्च 2011

शिव की बारात में उमड़े ‘नागा साधु’

पीथमपुर में रंग पंचमी से शुरू होने वाले मेले में भीड़ उमड़ रही है। मेले के पहले दिन भगवान शिव की बारात निकली, जिसमें देश के अनेक अखाड़ों से आए नागा साधु बड़ी संख्या में शामिल हुए और शौर्य प्रदर्शन किए। बाबा कलेश्वर नाथ धाम में दर्शन के लिए भक्त दूर-दूर से पहुंचते हैं। मेले की रौनकता में पहले से जरूर कमी आई है, मगर भगवान कलेश्वरनाथ के प्रति असीम श्रद्धा का ही परिणाम है कि अब भी मेले के माध्यम से एक प्राचीन संस्कृति की पहचान कायम है।

जिला मुख्यालय जांजगीर से 15 किमी दूर ग्राम पीथमपुर में बरसों से मेला लगता आ रहा है। बाबा कलेश्वरनाथ मंदिर में पूजा-पाठ के बाद चांदी की पालकी में भगवान शिव की बारात निकलती है और इस तरह मेला शुरू होता है। रंग-पंचमी के ही दिन पीथमपुर में मेला लगता है और यह सात दिन चलता है। पहले मेला तीन दिन का हुआ करता था। बदलते समय के साथ मेले के स्वरूप में काफी परिवर्तन आया है। मेले का खास आकर्षण देश के अनेक प्रदेशों के अखाड़ों से आए नागा साधु होते हैं। जिनके आशीर्वाद के लिए भी दूर-दूर से भक्त पहुंचते हैं।

पीथमपुर में लगने वाला मेला अंचल का अंतिम मेला होने के कारण लोगों का उत्साह देखने लायक रहता है और आसपास गांवों के अलावा दूसरे जिलों से भी लोगों का हुजूम उमड़ता है। मेले में मनोरंजन के साधन की भी व्यवस्था होती है, इसके चलते शाम को अधिक संख्या में लोगों का जमावड़ा होता है। इस वर्ष पीथमपुर मेले में इलाहाबाद, द्वारिकानाथ, बद्रीनाथ, गुजरात समेत अन्य स्थानों से पहुंचे हैं।


मंदिर के इतिहास पर एक नजर

बाबा कलेश्वरनाथ मंदिर परिसर की दीवार में लगे शिलालेख के मुताबिक मंदिर का निर्माण कार्तिक सुदी 2, संवत 1755 को किया गया था। बाद में मंदिर के जीर्ण-शीर्ण होने के कारण चांपा के जमींदारों ने निर्माण कराया। भगवान शिवजी की बारात की परिपाटी 1930 से शुरू होने की जानकारी मिलती है। इसके बाद से लगातर रंग पंचमी के दिन बारात की परंपरा कायम है और दूर-दूर से आकर नागा साधु शामिल होते हैं। पीथमपुर के कलेश्वरनाथ मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग है, इसे सपने में देखने के बाद एक परिवार के व्यक्ति ने खोदाई करवाकर निकलवाया था और फिर मंदिर का निर्माण कर प्रतिमा की स्थापना की गई। इस तरह पीथमपुर में शिव की बारात के साथ मेले का सिलसिला अब तक चल रहा है।

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

एक मिसाल परोपकार की

भारत के लोगों में परोपकार की धारणा बरसों से कायम है। भले ही परोपकार के तरीकों में समय-समय पद बदलाव जरूर आए हों, लेकिन अंततः यही कहा जा सकता है कि लोगों के दिलों में अब भी परोपकार की भावना समाई हुई है। इस बात को एक बार फिर सिद्ध कर दिखाया है, बेंगलूर के आईटी क्षेत्र के दिग्गज अजीम प्रेमजी ने। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के अपनी जानी-मानी कंपनी विप्रो की दौलत में से करीब 88 सौ करोड़ रूपये एक टस्ट को दिया है, जो काबिले तारीफ है। ऐसा कम देखने को मिलता है, जब कोई बड़ा उद्योगपति अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा परोपकार के लिए दें और लोगों के दुख-दर्द में सहभागी बनें। समाजसेवी अजीम प्रेमजी का परोपकार की सोच, आज के समाज के लिए बड़ी मिसाल है, जिससे अन्य उद्योगपतियों के बीच एक ऐसा संदेश गया है कि वे भी कुछ इसी तरह कार्य कर समाज के प्रति अपना दायित्व प्रदर्शित करें।
अधिकतर यह देखा जाता है कि पैसा आने के बाद उसके प्रति व्यक्ति का मोह कायम हो जाता है, साथ ही वह अपनी सौ-दो सौ पीढ़ी के बारे में सोचने लगता है। ऐसे में यह भी समझने की जरूरत रहनी चाहिए कि हम अपनी पीढ़ी को निकम्मे बनाने की कोशिश करते हैं। यहां एक बात बताना जरूरी है कि अमेरिका के माइक्रोसाफ्ट कंपनी के मालिक बिल गेट्स एक अरसे से दुनिया के उद्योगपतियों के बीच यह अभियान चला रहे हैं कि उद्योगपति अपनी दौलत परोपकार में भी लगाएं, जिससे समाजसेवा के प्रति उनकी समर्पण की भावना सीधा लोगों से जुड़ सकें। कुल-मिलाकर यही कहा जा सकता है कि कुछ लोग समाजसेवा के नाम अस्पतालों तथा आश्रमों में फल व कपड़ा बांटकर वाह-वाही लुटने की कोशिश करते हैं, उनके लिए यह सबक है। ऐसा नहीं है कि परोपकार के लिए अधिक राशि चाहिए, कम राशि होने के बाद भी लोगों के बीच समाजसेवा किया जा सकता है, लेकिन उसमें किसी तरह का दिखावा नहीं होना चाहिए। यहां एक बार फिर समाजसेवी श्री प्रेमजी का जिक्र करना होगा, क्योंकि उन्होंने 88 सौ करोड़ रूपये देकर केवल परोपकार की भावना को सच्चे मन से व्यक्त किया है।
मैं समाजसेवी श्री प्रेमजी से परिचित नहीं हूं, लेकिन मीडिया में उनके बारे में जानकारी मिलने के बाद, अपने आपको इस परोपकार की मिसाल पर लिखने से नहीं रोक सका। निश्चित ही ऐसा व्यक्तित्व भारतीय समाज और देश के लिए गौरव की बात है, क्योंकि जिस देश में आज की स्थिति में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हो गई हों और धनपुरूशों में पैसा बटोरने का ऐसा बुखार चढ़ गया है, जिससे गरीब जनता पीस रही है। देश के धन को विदेशी बैंकों में जमाकर, उसे काला धन बनाने का जो कुत्सित प्रयास बरसों से जारी है, ऐसे लोगों को श्री प्रेमजी की परोपकारी भावना से रूबरू होना चाहिए, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई लोगों की भलाई के लिए न्यौछावर कर दिया।

बुधवार, 10 नवंबर 2010

ईट से बना खरौद का ईंदलदेव

जिला मुख्यालय जांजगीर से 55 किमी की दूरी पर छत्तीसगढ़ की काशी के नाम से विख्यात लक्ष्मणेश्वर की नगरी खरौद स्थित है। इस धार्मिक नगरी में भगवान लक्ष्णेश्वर का मंदिर है। यहां के लक्षलिंग में एक लाख छिद्र हैं और यहां महाशिवरात्रि समेत तेरस और सावन मास मंे मेला लगता है तथा श्रद्धालुओं की संख्या भी हजारों की संख्या में जुटती है। खरौद में शबरी माता का भी मंदिर है, इसकी प्राचीन पहचान है। मंदिर के द्वार पर अद्धनारीश्वर की प्रतिमा है, जिस देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। पर्यटक, खरौद में पुरातात्विक धरोहर की एक झलक देखने की तमन्ना हर किसी में होती है। भगवान लक्ष्मणेश्वर की ख्याति प्रदेश के अलावा दूसरे स्थानों में भी है। खरौद के मांझापारा में स्थित ईंदलदेव का मंदिर बरसों से लोगों का आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। पुरातत्व के जानकार इस मंदिर को 6 वीं शताब्दी का बताते हैं। इस मंदिर को जांजगीर-चांपा जिले का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है। ईंदलदेव मंदिर में स्थापत्यकला की अमिट छाप देखने को मिलती है। मंदिर की विशेषता यह है कि मंदिर का द्वार पिछले हिस्से में है और मुख्य द्वार के दोनों ओर मां गंगा की प्रतिमा बनी हुई है, वह भी ईट से। खास बात यह भी है कि मंदिर में प्र्रतिमा विराजित नहीं है। करीब 40 फीट उंचे ईंदलदेव मंदिर के चारों ओर ईट से आकर्षक कलाकृतियां बनाई गई हैं, कहीं गुंबद का निर्माण किया गया है तो कहीं, देवी-देवताओं के चित्रों को भी आकर्षक ढंग से उकेरा गया है। मंदिर की महत्ता और प्राचीनता को देखते हुए न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि दूसरे प्रदेशों से भी पुराविद और इतिहासकार शोध के लिए आते हैं। विदेशों से भी पर्यटक मंदिर की बनावट देखने आ चुके हैं और ईट से बने ईंदलदेव मंदिर की खासियत को देखकर वे भी हतप्रभ रहे हैं। मंदिर के संरक्षण की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग के पास है और इस मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए कुछ प्रयास हुए हैं, लेकिन जिस तरह से प्राकृतिक आपदा के कारण ईट से बनी कलाकृति मिट रही है, जिसे बचाए और संरक्षित किए जाने की जरूरत है। अंधड़ और बारिष के प्रभाव में बरसों से मंदिर के रहने के कारण चारों ओर बनी स्थापत्यकला की बेजोड़ कलाकृति और चित्र प्रभावित हो रहे हैं। मंदिर की विरासत को कायम रखने प्राकृतिक आपदा के प्रभाव से निपटने पुराविद विभाग को ठोस पहल करना चाहिए। एक दशक पहले ईंटलदेव मंदिर की हालत काफी बिगड़ गई थी। बाद में पुरातत्व विभाग ने सुध लेते हुए मंदिर का कायाकल्प किया, लेकिन फिर भी मंदिर की दीवारों में बनी बेजोड़ कलाकृति को बचाने की कवायद आगामी दिनों में भी जरूरी है। पुरातत्व के जानकार डा. नन्हें प्रसाद द्विवेदी का कहना है कि ईंदलदेव मंदिर की प्राचीनता के कारण इसके बारे में लगातार शोध कार्य हो रहे हैं और ईट से बने होने के कारण यह स्थापत्यकला की दृष्टि से जिले ही नहीं, वरन प्रदेश की बेजोड़ कृति है, जिसकी बनावट देखते ही बनती है।

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ का गुप्त प्रयाग, शिवरीनारायण

छत्तीसगढ़ के गुप्त प्रयाग के नाम से दर्षनीय स्थल षिवरीनारायण को जाना जाता है और इस धार्मिक नगरी को छग षासन द्वारा टेंपल सिटी घोशित किया गया है। वैसे तो इस आस्था के केन्द्र की पहचान प्राचीन काल से है, लेकिन धार्मिक नगरी घोशित होने के बाद इसकी प्रसिद्धि और ज्यादा बढ़ गई।छत्तीसगढ़ के कई धार्मिक नगरी और पुरातन स्थलों में दषकों से मेला लगता आ रहा है। मेले में खेल-तमाषे के अलावा सिनेमा पहुंचता है, जो लोगों के प्रमुख मनोरंजन के साधन होते हैं। साथ ही मेले में समाप्त होते-होते षादी विवाह का दौर षुरू हो जाता है। वैसे तो मेले के आयोजन की विरासत दषकों से छत्तीसगढ़ में षामिल हैं, जो परिपाटी अब भी जारी है। जांजगीर-चांपा जिले में बसंत पंचमी के दिन से कुटीघाट में पांच दिवसीय मेला षुरू होता है। इसके बाद छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा माने जाने वाल षिवरीनारायण मेला, माघी पूर्णिमा से प्रारंभ होता है, जो महाषिवरात्रि तक चलता है। इस बीच जिले के अनेक स्थानों में मेला लगता है और अंत धूल पंचमी के समय पीथमपुर के महाकलेष्वर धाम में लगने वाले मेले के साथ समाप्त होता है। इस मेले में भगवान षिव की बारात में बड़ी संख्या में नागा साधु षामिल होते हैं। इन स्थानों में लगने वाले मेलों में दूसरे राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं और यहां की विरासत तथा इतिहास से रूबरू होते हैं। दूसरी ओर महाषिवरात्रि पर्व के दिन प्रदेष का सबसे बड़े एकदिवसीय मेले का अयोजन छग की काषी खरौद लक्ष्मणेष्वर धाम में होता है, जहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और लोगों की आस्था देखते ही बनती है। भक्त कई घंटों तक कतार में लगकर भगवान षिव के एक दर्षन पाने लालायित रहते हैं। इधर हर वर्श माघी पूर्णिमा से षिवरीनारायण में लगने वाले मेले में उड़ीसा, मध्यप्रदेष, उत्तरप्रदेष, महाराश्ट्र, झारखंड तथा बिहार समेत कई राज्यों के दर्षनार्थी आते हैं और माघी पूर्णिमा पर महानदी के त्रिवेणी संगम में होने वाले षाही स्नान में सैकड़ों की संख्या में जहां साधु-संत षामिल होते हैं, वहीं हजारों की संख्या में दूरस्थ क्षेत्रों से आए श्रद्धालु भी इस पावन जल पर डूबकी लगाते हैं। माघी पूर्णिमा के स्नान को लेकर मान्यता है कि माघ मास में दान कर त्रिवेणी संगम में स्नान करने से अष्वमेध यज्ञ करने जैसा पुण्य मिलता है और कहा जाता है कि इस माह की हर तिथि किसी पर्व से कम नहीं होता। इस दौरान किए जाने वाले दान का फल दस हजार गुना ज्यादा मिलता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। षिवरीनारायण को पुरी में विराजे भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान माना जाता है और मान्यता है कि भगवान जी माघी पूर्णिमा के दिन यहां विराजते हैं। यही कारण है कि श्रद्धालुओं की आस्था यहां उमड़ती हैं और वे चित्रोत्पला महानदी, षिवनाथ और जोंक नदी के त्रिवेणी संगम में स्नान कर भगवान जगन्नाथ के दर्षन करने पहुंचते हैं। षिवरीनारायण में कई दषकों से मेला लगता आ रहा है। 15 दिनों तक चलने वाले इस मेले की अपनी एक अलग ही पहचान है। अविभाजित मध्यप्रदेष के समय से षिवरीनारायण का यह मेला आकर्शण का केन्द्र रहा है, अब भी इसकी चमक फीकी नहीं पड़ी है। यही कारण है कि मेले को देखने और भगवान के दर्षन के लिए दूसरे राज्यों के दर्षनार्थी भी पहुंचते हैं। साथ ही विदेषों से भी लोग आकर भगवान की महिमा का गान करते हैं और इस विषाल मेले को देखकर मंत्रगुग्ध हो जाते हैं। षिवरीनारायण में भगवान षिवरीनारायण मंदिर के अलावा षिवरीनारायण मठ, केषवनारायण मंदिर, सिंदूरगिरी पर्वत, लक्ष्मीनारायण मंदिर, षक्तिपीठ मां अन्नपूर्णा, मां काली मंदिर षामिल हैं। यहां का भगवान षिवरीनारायण मंदिर का निर्माण कल्चुरी काल में हुआ था। ऐसा माना जाता है िकइस मंदिर की उंचाई, प्रदेष के सभी मंदिरों की उंचाई से अधिक है। मंदिर की दीवारें में उत्कृश्ट स्थापत्य कला की छठा दिखाई देती है, जो यहां पहुंचने वाले दर्षनार्थियों को अपनी ओर आकर्शित कर ही लेती है। यहां के प्राचीन षबरी मंदिर, जो ईट से बना है, इसमें की गई कलाकृति अब भी पुराविदों और इतिहासकारों के अध्ययन का केन्द्र बना हुआ है। सिंदूरगिरी पर्वत के बारे में कहा जाता है कि यहां अनेक साधु-संतों ने तप किया है और उनकी यह स्थान तप स्थली रही है। इस पर्वत से त्रिवेणी संगम का मनोरम दृष्य देखते ही बनता है। किवदंति है कि प्राचीन काल में जगन्नाथ पुरी जाने का यह मार्ग था और भगवान राम इसी रास्ते से गुजरे थे तथा माता षबरी से जूठे बेर खाए थे। इस बात का कुछ प्रमाण जानकार बताते भी हैं। इसी के चलते षिवरीनारायण में लगने वाले मेले में उड़ीसा से आने वाला उखरा और आगरा से आने वाले पेठे की खूब मांग रहती है तथा इसकी मिठास को लेकर भी लोगों में इसे खरीदने को लेकर उत्सुकता भी देखी जाती है। षिवरीनारायण पुराने समय में तहसील मुख्यालय था और इसकी भी अपनी विरासत है। साथ ही भारतेन्दुयुगीन साहित्य की छाप भी यहां पड़ी है और यह नगरी उस दौरान साहित्यिक तीर्थ बन गई थी। मेले के पहले दिन से ही रामनामी पंथ के लोगों का भी पांच दिवसीय राम नाम का भजन प्रारंभ होता है। पुरे षरीर में राम नाम का गोदमा गुदवाए रामनामी पंथ के लोग भगवान राम के अराध्य में पूरे समय लगे रहते हैं। इससे नगर में राम नाम का माहौल देखने लायक रहता है। षिवरीनारायण मेले के बारे में मठ मंदिर के मठाधीष राजेश्री महंत रामसुंदर दास का कहना है कि षिवरीनारायण में मेला का चलन प्राचीन समय से ही चला आ रहा है और यह छग का सबसे पुराना और बड़ा मेला है। इस मेले में दूसरे राज्यों के अलावा सैकड़ों गांवों के लाखों लोगों की भीड़ जुटती है। लोगों के मनोरंजन के लिए सर्कस, सिनेमा, मौत कुआं समेत अन्य साधन आकर्शण का केन्द्र रहते हैं। मेले की यह भी खासियत है कि यहां हर वह सामग्री मिल जाती है, जो दुकानों में नहीं मिलती। यही कारण है कि षिवरीनारायण मेले में लोगों द्वारा जमकर खरीददारी की जाती है। इसके अलावा षादी-विवाह की सामग्री भी लोग खरीदते हैं। उनका कहना है कि माघी पूर्णिमा से लगने वाले इस मेले के पहले दिन महानदी के त्रिवेणी संगम की निर्मल धारा पर लोग डूबकी लगाते हैं और खुद को धन्य महसूस करते हैं। इस दिन लाखों की संख्या में लोगों का आगमन षिवरीनारायण में होता है। पुरी से भी लोग आते हैं, क्योंकि भगवान जगन्नाथ एक दिन के लिए यहां विराजते हैं और वहां भोग नहीं लगता। साथ ही वहां के मंदिर के पट को भी बंद रखा जाता है। कुल-मिलाकर षिवरीनारायण के जगन्नाथ धाम में श्रद्धालु भगवान की भक्ति में रमे रहते हैं। माघी पूर्णिमा की सुबह भगवान षिवरीनारायण के दर्षन के लिए सैकड़ों किमी से श्रद्धालु जमीन पर लोट मारते मंदिर के पट तक पहुंचते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से जो भी मनोकामना होती है, वह पूरी होती है। माघी पूर्णिमा पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं को कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा भोजन और नाष्ता प्रदान किया जाता है। षिवरीनारायण के नगर विकास समिति द्वारा पिछले कई बरसों से दूर-दूर से आने वाले भक्तों को भोजन कराने की व्यवस्था की जाती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि समिति द्वारा लगातार दो दिनों तक बिना रूके, भोजन प्रदान किया जाता है। एक पंगत के उठते ही दूसरी पंगत बिठा दी जाती है। इस तरह हजारों की संख्या में श्रद्धालु भोजन स्वरूप भगवान षिवरीनारायण का प्रसाद ग्रहण करते हैं। समिति के अध्यक्ष राजेष अग्रवाल का कहना है कि दूसरे राज्यों से भी भक्त आते हैं और सुबह से ही भूखे-प्यासे वे भगवान के दर्षन करने में लीन रहते हैं। इस तरह जब वे भगवान के दर्षन प्राप्त करने कर लेते हैं तो उन्हें भोजन कराकर आत्मीय तृप्ति मिलती हैं। उनका कहना है कि ऐसा पिछले कई वर्शों से किया जा रहा है, ऐसी परिपाटी आगामी समय में कायम रखी जाएगी।बहरहाल षिवरीनाराण में लगने वाले मेले की छाप अब भी वैसा ही बरकरार है, जैसे बरसों पहले थे। मेले में आने वाली लोगों की भीड़ की संख्या में बदलते समय के साथ जितना फर्क पड़ता है, वह नजर नहीं आता। हालांकि मेले और यहां हर बरस होने वाले महोत्सव को लेकर राज्य सरकार की बेरूखी जरूर नजर आ रही है और आयोजन पर पिछले बरस से विराम लग गया है। सरकार द्वारा सहयोगात्मक रवैया अपनाया जाता है तो इस प्राचीन मेले की पहचान को आगे भी कायम रखा जा सकता है।

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ की काषी खरौद

छत्तीसगढ़, धार्मिक नगरी और पर्यटन की दृष्टि से एक समृद्धषाली राज्य है। अधिकांष इलाके वन क्षेत्रों से आच्छादित हैं और पहाड़ों के मनोरम दृष्य भी है। साथ ही प्रदेष में अनेक ऐसे धार्मिक स्थान है, जहां लोगों की आस्था उमड़ती है। ऐसा ही एक धार्मिक स्थल लक्ष्मणेष्वर धाम खरौद है, जिसे छत्तीसगढ़ की काषी के नाम से भी जाना जता है। अपनी पुरातात्विक महत्ता के कारण पुराविदों और इतिहासविदों के अध्ययन का यह नगरी हमेषा से ही केन्द्र रहा है। खरौद की एक पुरातात्विक और धार्मिक विरासत है, जिसे अब मंदिरों में बनी कलाकृति और षिलालेखों से जाना जा सकता है। पुरातन धरोहरों को समेटे मंदिरों की दीवारों व षिलालेखों पर कई ऐसे ष्लोक हैं, जिससे रामायणकालीन समय की याद ताजा हो जाती है।
जिला मुख्यालय जांजगीर से 55 किमी और बिलासपुर रेलवे जंक्षन से 65 किमी दूर बसे इस धार्मिक नगरी खरौद की पहचान तालाबों की नगरी के रूप में भी होती है। लक्ष्मणेष्वर की नगरी में 126 तालाब हैं, जिससे छत्तीसगढ़ी में बुजुर्गों द्वारा छह आगर छह कोरी कहा जाता है। खरौद में यह देखने में आता है कि जिस ओर नजरें घुमाएं, उस ओर तालाब जरूर दिखता है। साथ ही इन तालाबों के किनारे मंदिर बना हुआ दिखता है। खरौद के नामकरण को खरदूषण राजा से भी जोड़ा जाता है, वैसे पुराविद, खरौद में षैव परंपरा होने की बात कहते हैं। बदलते समय के साथ और मंदिरों का जीर्णोद्धार नहीं होने से कई मंदिर जहां खंडित हो गए हैं तो कई तालाब भी अब इतिहास बन चुके हैं। फिर भी खरौद में पुरातात्विक धरोहरों के कई अजूबे पहचान कायम है, जिसे देखने श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। खरौद में महाषिवरात्रि पर लगने वाला सबसे बड़ा मेला पूरे छत्तीसगढ़ में विख्यात है और इस दिन लक्ष्मणेष्वर धाम में भक्तों का रेला उमड़ता है। मंदिर का पट सुबह 4 बजे खुलते ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है और भगवान के दर्षन का सिलसिला देर रात तक चलता रहता है।

खरौद वैसे अनेक मंदिरों का केन्द्र है और सबकी अपनी-अपनी अलग-अलग विरासत है। नगर में स्थित भगवान लक्ष्मणेष्वर का मंदिर की महिमा अपार है और इसकी कई खासियतें हैं। 12 वीं षताब्दी में बना यह मंदिर लगभग 110 फीट चैड़ा भू-भाग में स्थित है और 30 फीट का गोलाई लिए हुआ है। महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर में स्थापित लक्ष लिंग जमीन से करीब 48 फीट उपर स्थित है। इस लक्ष लिंग में एक लाख छिद्र होना माने जाते हैं और श्रद्धालु, श्रद्धाभाव से यहां एक लाख चावल चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं। लक्षलिंग में हमेषा जल भरा रहता है और खराब भी नहीं होता, जबकि यह लक्षलिंग जमीन तल से अत्यधिक उपर है। माना जाता है कि लक्षलिंग में जो जल चढ़ाया जाता है, वह मंदिर के पिछले हिस्से में स्थित कुण्ड में चला जाता है। जिससे कुण्ड कभी सूखता नहीं है। भक्तों में आस्था है कि भगवान षिव के दर्षन मात्र से क्षय रोग दूर हो जाता है। लक्ष्मणेष्वर मंदिर के चारों ओर बड़ी दीवार बनी हुई और मंदिर के भीतर बड़ी जगह बनाई गई है, जिससे वृहदाकार निर्माण की बात पुराविद कहते हैं। मंदिर के बाहर एक कुआं स्थित है, जहां सिक्के डाले जाने की परंपरा है, यह कहा जाता है कि सिक्के के दीवार से नहीं टकराने पर षुभ होता है। भक्तों में यह भी मान्यता है कि यहां सच्चे मन से जो भी मांगा जाता है, वह पूरी होती है। इसी के चलते खरौद में महापर्व महाषिवरात्रि के अलावा सावन महीने में हर सोमवार और तेरस पर भक्तों की भीड़ देखने लायक रहती है। इन अवसरों पर दूसरे प्रदेषों से भी दर्षनार्थी भगवान लक्ष्मणेष्वर के दर्षन के लिए पहुंचते हैं। लक्ष्मणेष्वर मंदिर के अलावा खरौद में प्राचीन ईंदल देव और षबरी माता का मंदिर भी है। ईंदलदेव का मंदिर ईंट से बना है और जानकार इसे 6 वीं षताब्दी में बने होने की बात कहते हैं। ईंदलदेव मंदिर को जिले का सबसे पुरातन मंदिर माना जाता है, जिसकी दीवारों पर अनोखी कलाकृति बनाई गई है। ईंट के बने होने के कारण इतिहासविदों द्वारा हमेषा यहां षोध कार्य किया जाता है और विदेषों से भी लोग पहुंचकर यहां से जानकारी लेते हैं। पुरातत्व विभाग द्वारा प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किए जाने से मंदिर में किसी तरह निर्माण करने पर रोक है। ईंदलदेव मंदिर की जीर्ण होने की स्थिति में कुछ साल पहले पुरातत्व विभाग ने जीर्णोद्धार कराया था, इससे मंदिर को लोहे के राड से बांधा गया था। इस मंदिर की खासियत यह भी है कि इसका मुख्य द्वार पीछे की ओर और द्वार पर मां गंगे की तस्वीर उकेरी गई है। ईंदलदेव मंदिर में कई अनेक खूबियां हैं, जिसके चलते यह मंदिर पर्यटकों और पुराविदों को अपनी ओर वर्षों से आकर्षित करता आ रहा है।

षबरी मंदिर की अपनी एक पुरातात्विक पहचान अब भी कायम है। मंदिर के द्वार पर अद्धनारीष्वर की प्रतिमा स्थित है, जिसमें भगवान षिव और पार्वती की तस्वीर उकेरी गई है, जो पर्यटकों का केन्द्र बिन्दु होता है। षबरी मंदिर के कुछ हिस्से फर्षी पत्थर से बने हैं तो उपरी हिस्सा ईट से बनाया गया है। ईंट से बने होने के कारण इस मंदिर को भी देखने इतिहासविद और पुराविद पहुंचते हैं। षबरी मंदिर के षिलालेख में भी कई पुरातन ष्लोक लिखे गए हैं, जिससे खरौद नगरी के पुरातन गुणगान का पता चलता है और इन मंदिरों के दर्षनार्थ श्रद्धालु पहुंचते हैं।

फिलहाल खरौद को छत्तीसगढ़ षासन द्वारा दर्षनीय स्थल घोषित किया गया है, लेकिन जो विकास इस नगरी का होना चाहिए, वह नहीं हो सका है। मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए सामुदायिक भवन जैसी अन्य सुविधाओं की जरूरत है, मगर अब तक ऐसी कोई पहल नहीं की गई है। साथ ही नगर पंचायत द्वारा भी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया है। पुरातत्व विभाग के अधीन सभी मंदिरों के होने से निर्माण नहीं कराए जा पा रहे हैं, जबकि मंदिर में हर वर्ष चढ़ावे से लाखों रूपये की आय होती है। इस आय का अब तक कोई हिसाब नहीं रखा गया है और मंदिर की पूजा-अर्चना कार्य में लगे पुजारी ही इन राषियों को आपस में बांट लेते हैं। वैसे यहां ट्रस्ट बनाने की मांग समय-समय पर उठती रही है, किन्त यह पहल भी अधूरी है।