जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम पहरिया के पहाड़ में मां अन्नधरी दाई विराजित हैं। करीब 30 एकड़ क्षेत्र में फैल इस पहाड़ में हजारों इमारती पेड़ है, जिसे लोगों के द्वारा नहीं काटा जाता। पहाड़ में लकड़ियां पड़ी रहती हैं और दीमक का निवाला बनती है, मगर लकड़ियों को उपयोग के लिए कोई नहीं ले जाता। यह भी लोगों के बीच धारणा है कि जो भी मां अन्नधरी दाई के पहाड़ पर स्थित इमारती लकड़ी को घर लेकर गया, उस पर मां की कृपा नहीं होती और उस पर दुखों का पहाड़ टूट जाता है। उसे और उसके परिवार पर आफत आ जाती है। यही कारण है कि पहाड़ पर लकड़ियां सड़ती-गलती रह जाती हैं, लेकिन उसे कोई हाथ नहीं लगाता। इस तरह मां ही हरियाली की रखवाली करती हैं और यह पर्यावरण संरक्षण की दिषा में सार्थक पहल हो रही है। साथ ही इससे समाज में भी संदेष जाता है, क्योंकि आज की स्थिति में जिस तरह जंगल काटे जा रहे हैं, वहीं पहरिया में जो लोगों के मन भावना है, उससे निष्चित ही पर्यावरण संरक्षण की दिषा में कार्य जरूर हो रहा है। जिला मुख्यालय जांजगीर से 20 किमी तथा बलौदा विकासखंड से ग्राम पहरिया की दूरी करीब 10 किमी है। पहरिया, चारों ओर से पहाड़ों और हरियाली से घिरा हुआ है, लेकिन मां अन्नधरी दाई जिस पहाड़ में स्थित है, वह जमीन तल से काफी उपर है। करीब 100 फीट उपर पहाड़ पर हजारों की संख्या में छोटे-बड़े इमारती पेड़ हैं, जिससे हरियाली तो फैली हुई है। साथ ही पेड़ों की कटाई नहीं होने से पर्यावरण संरक्षण में यह सार्थक साबित हो रहा है। यही कारण है कि पहरिया समेत इलाके के लोगों में मां अन्नधरी दाई के प्रति असीम श्रद्धा है और साल के दोनों नवरात्रि में यहां ज्योति कलष प्रज्जवलित भक्तों द्वारा कराए जाते हैं। इसके अलावा मां की महिमा के बखान सुनकर दूर-दूर से लोग पहाड़ीवाली मां अन्नधरी दाई के दर्षन के लिए पहुंचते हैं। ग्राम पहरिया के दरोगा राम का कहना है कि लोगों में मां के प्रति आस्था की जो भावना है और पेड़ों के संरक्षण के प्रति जो लोगों में जागरूकता बरसों से कायम है, वह निष्चित ही समाज के अन्य लोगों के लिए एक अच्छा संदेष ही माना जा सकता है, क्योंकि जहां जंगल दिनों-दि कट रहे हैं और पर्यावरण के हालात बिगड़ रहे हैं, वहीं ग्राम पहरिया में मां अन्नधरी की महिमा की खाति जो परिपाटी चल रही है, वह काबिले तारीफ है और इसे अन्य लोगों को भी आत्मसात करने की जरूरत है। यदि इस तरह पहल अन्य जगहों में होने लगे तो वह दिन दूर नहीं, जब पेड़ों की अंधा-धुंध कटाई में कमी जरूर आ जाएगी। अंत में मां अन्नधरी दाई को प्रणाम और लोगों की आस्था को सलाम। निष्चित ही यह समाज के लिए प्रेरणादायी अवसर है। मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
हरियाली की रखवाली मां के हाथ में
जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम पहरिया के पहाड़ में मां अन्नधरी दाई विराजित हैं। करीब 30 एकड़ क्षेत्र में फैल इस पहाड़ में हजारों इमारती पेड़ है, जिसे लोगों के द्वारा नहीं काटा जाता। पहाड़ में लकड़ियां पड़ी रहती हैं और दीमक का निवाला बनती है, मगर लकड़ियों को उपयोग के लिए कोई नहीं ले जाता। यह भी लोगों के बीच धारणा है कि जो भी मां अन्नधरी दाई के पहाड़ पर स्थित इमारती लकड़ी को घर लेकर गया, उस पर मां की कृपा नहीं होती और उस पर दुखों का पहाड़ टूट जाता है। उसे और उसके परिवार पर आफत आ जाती है। यही कारण है कि पहाड़ पर लकड़ियां सड़ती-गलती रह जाती हैं, लेकिन उसे कोई हाथ नहीं लगाता। इस तरह मां ही हरियाली की रखवाली करती हैं और यह पर्यावरण संरक्षण की दिषा में सार्थक पहल हो रही है। साथ ही इससे समाज में भी संदेष जाता है, क्योंकि आज की स्थिति में जिस तरह जंगल काटे जा रहे हैं, वहीं पहरिया में जो लोगों के मन भावना है, उससे निष्चित ही पर्यावरण संरक्षण की दिषा में कार्य जरूर हो रहा है। जिला मुख्यालय जांजगीर से 20 किमी तथा बलौदा विकासखंड से ग्राम पहरिया की दूरी करीब 10 किमी है। पहरिया, चारों ओर से पहाड़ों और हरियाली से घिरा हुआ है, लेकिन मां अन्नधरी दाई जिस पहाड़ में स्थित है, वह जमीन तल से काफी उपर है। करीब 100 फीट उपर पहाड़ पर हजारों की संख्या में छोटे-बड़े इमारती पेड़ हैं, जिससे हरियाली तो फैली हुई है। साथ ही पेड़ों की कटाई नहीं होने से पर्यावरण संरक्षण में यह सार्थक साबित हो रहा है। यही कारण है कि पहरिया समेत इलाके के लोगों में मां अन्नधरी दाई के प्रति असीम श्रद्धा है और साल के दोनों नवरात्रि में यहां ज्योति कलष प्रज्जवलित भक्तों द्वारा कराए जाते हैं। इसके अलावा मां की महिमा के बखान सुनकर दूर-दूर से लोग पहाड़ीवाली मां अन्नधरी दाई के दर्षन के लिए पहुंचते हैं। ग्राम पहरिया के दरोगा राम का कहना है कि लोगों में मां के प्रति आस्था की जो भावना है और पेड़ों के संरक्षण के प्रति जो लोगों में जागरूकता बरसों से कायम है, वह निष्चित ही समाज के अन्य लोगों के लिए एक अच्छा संदेष ही माना जा सकता है, क्योंकि जहां जंगल दिनों-दि कट रहे हैं और पर्यावरण के हालात बिगड़ रहे हैं, वहीं ग्राम पहरिया में मां अन्नधरी की महिमा की खाति जो परिपाटी चल रही है, वह काबिले तारीफ है और इसे अन्य लोगों को भी आत्मसात करने की जरूरत है। यदि इस तरह पहल अन्य जगहों में होने लगे तो वह दिन दूर नहीं, जब पेड़ों की अंधा-धुंध कटाई में कमी जरूर आ जाएगी। अंत में मां अन्नधरी दाई को प्रणाम और लोगों की आस्था को सलाम। निष्चित ही यह समाज के लिए प्रेरणादायी अवसर है। गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
नैला में विराजीं धन दुर्गा
जिला मुख्यालय जांजगीर से लगे नैला के रेलवे स्टेशन के पास श्री-श्री दुर्गा उत्सव समिति द्वारा विराजित की गई दुर्गा की प्रतिमा को देखने लोगों की भीड़ जुट रही है। मूर्ति की खासियत यह है की नव दुर्गा की प्रतिमा में २१ हजार चांदी के सिक्के जड़े गए हैं। इस मूर्ति की अनुमानित कीमत ८० से ९० लाख बताई जा रही है। नवरात्री के छठवें दिन शाम को जब दुर्गा को अद्भुत प्रतिमा स्थापित की गई, उसके बाद नैला स्टेशन के पास लोगों की सुबह से देर रात तक भीड़ लगी रही। समिति के सदस्यों ने बताया की संभवतः इस तरह की प्रतिमा अन्य राज्यों में माँ दुर्गा की प्रतिमा विराजित नहीं की गई है। छत्तीसगढ़ में तो ऐसी अद्भुत प्रतिमा और धन दुर्गा पहली बार विराजित हुई हैं। समिति द्वारा पिछले साल १०-१० रूपये के सिक्के जड़कर माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाई गई थी। इस दौरान भी लोगों की आस्था उमड़ी थी। उससे पहले समिति के सदस्यों ने शिप और नारियल की प्रतिमा बनवाई थी। उसे भी लोगों ने खूब पसंद किया था। इन प्रतिमाओं को कोरबा के कलाकार गोरे स्वर आकृति दी जाती है। इस साल भी बनाई गई २१ हजार चंडी के सिक्के की प्रतिमा को उन्हीं ने ही आकृति दी है।
नवरात्री के तीन दिनों तक हजारों लोगों ने चांदी के सिक्के से बनी प्रतिमा को देखने पहिंचे और सभी होते नजर आये।
सभी पर माँ दुर्गा की कृपा बनी रहे। इसी आशा के साथ
आदि शक्ति माता को प्रणाम।
बुधवार, 13 अक्टूबर 2010
सीने पर आस्था की ज्योत
जांजगीर-चाम्पा जिले के टेम्पल सिटी शिवरीनारायण के थाना चौक के पास दुर्गा पंडाल में सारंगढ़ के बाबा संतराम ने सीने पर आस्था की ज्योत जलाई है, जिसे देखने लोगों की भीड़ उमड़ रही है। इससे पहले वे कई शक्तिपीठो में इस तरह आस्था प्रदर्शित कर चुके हैं। शारीर पर जवारा बो कर पुरे नौ दिन वे माँ नवदुर्गा की भक्ति में लीं रहते हैं। आज की इस कलयुग में इस तरह आस्था की मिसाल विरले ही पेश कर पाते हैं।रविवार, 10 अक्टूबर 2010
नारीशक्ति और नशाबंदी
समाज के विकास में आज बहुत बड़ी बाधा है तो वह है, नशाखोरी। नशा, मनुष्य का हर दृष्टी से नशा है, फिर लोग जागरूक होते नजर नहीं आ रहे हैं। यह सबसे बड़ा चिंता का विषय है। नशाखोरी की चपेट में युवा वर्ग ज्यादा आ रहे हैं। इससे निश्चित ही समाज का लगातार विघटन हो रहा है। नशाखोरी को रोकने सरकार की रूचि भी कहीं नजर नहीं आती। ऐसे में हमें लगता है, नारीशक्ति ही समाज की इस समस्या को खत्म कर सकती है। वैसे तो नारियों अबला कहा जाता है, लेकिन मेरा मन्ना है की जब नारीशक्ति जागृत हो जाती हैं तो फिर समाज में कोई भी कुरीति टिक नहीं पाती।
इस बात को सिध्ध कर नारियों ने कर दिखाया है। पिछले कुछ समय से शराबखोरी के चलते कई घर तबाह होते देखे गए हैं। इस स्थिति में अब नारी जाग गई हैं। इसी का परिणाम है की जगह-जगह शराब की वैध और अवैध बिक्री को लेकर आन्दोलन शुरू हो गए हैं। छत्तीसगढ़ के किसी न किसी इलाके में यह बात इन दिनों सुनने में आ रही है की स्व सहायता समूह समेत अन्य वर्ग की महिलाओं ने शराब बंदी के मोर्चा खोला। अभी हाल ही में रायपुर के अलग-अलग क्षेत्र की महिलाएं मुख्यमत्री डॉ रमण सिंह के जनदर्शन कार्यक्रम में शिकायत लेकर पहुंची। यहाँ मुख्यमंत्री ने महिलाओं की परेशानियों को गंभीरता से लिया और इस मामले में करवाई के निर्देश दिए। साथ ही अवैध बिक्री पर रोक लगाने की बात कही।
ऐसा माहौल पहली बार नहीं बना है, जब महिलाओं ने नशाखोरी का विरोध ना किया हो। वैसे भी नशाखोरी से सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभाविर होती हैं। ऐसे में महिलाओं की शराब के खिलाफ मोर्च खोला जाना कई मायनों में अहम् है। यह बात भी सनातन काल से कही जाती रही है की महिलाएं ही समाज सुधरने में मुख्या भूमिका निभाती रही हैं।
नशाखोरी के चलते अपराध में लगातार वृद्धि हो रहे हैं, यह बात भी प्रमाणित हो गई है। ऐसे में यदि सरकार नशाखोरी को रोकने पहल ना करे तो भला इसे क्या कहा जा सकता है। सरकार कहती है की आकारी ठेके से करोड़ों की आय होती है। हमारा कहना है की क्या लोगों के घरों तबाह करके कमाए गए रुपयों की कोई अहमियत रह जाती है। वैसे भी छत्तीसगढ़ में खनिज का अपार भण्डार है, लेकिन सरकार है की रायल्टी चोरी को रोकने कोई कदम नहीं उठती, लेकिन समाज को बर्बाद करने के लिए हर साल शराब की दूकान बढ़ाये जा रहे हैं। ऊपर से गांवों में जिस तरह से अवैध ढंग से शराब की बिकवाली होती है, उससे पूरी सरकार कटघरे में कड़ी नजर आती है। मगर अफसोस इस राज्य में विपक्ष में बैठी कांग्रेस के नेता इस मुद्दे को उठाने के बजाय मूकदर्शक बने बैठे हैं। ऐसे हालात में नारी शक्ति को ही जागरूक होकर नशाबंदी के खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी। नहीं तो अभी केवल घर तबाह हो रहे हैं, बाद में समाज का क्या स्थिति बनेगी, कहा नहीं जा सकता।
इस बात को सिध्ध कर नारियों ने कर दिखाया है। पिछले कुछ समय से शराबखोरी के चलते कई घर तबाह होते देखे गए हैं। इस स्थिति में अब नारी जाग गई हैं। इसी का परिणाम है की जगह-जगह शराब की वैध और अवैध बिक्री को लेकर आन्दोलन शुरू हो गए हैं। छत्तीसगढ़ के किसी न किसी इलाके में यह बात इन दिनों सुनने में आ रही है की स्व सहायता समूह समेत अन्य वर्ग की महिलाओं ने शराब बंदी के मोर्चा खोला। अभी हाल ही में रायपुर के अलग-अलग क्षेत्र की महिलाएं मुख्यमत्री डॉ रमण सिंह के जनदर्शन कार्यक्रम में शिकायत लेकर पहुंची। यहाँ मुख्यमंत्री ने महिलाओं की परेशानियों को गंभीरता से लिया और इस मामले में करवाई के निर्देश दिए। साथ ही अवैध बिक्री पर रोक लगाने की बात कही।
ऐसा माहौल पहली बार नहीं बना है, जब महिलाओं ने नशाखोरी का विरोध ना किया हो। वैसे भी नशाखोरी से सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभाविर होती हैं। ऐसे में महिलाओं की शराब के खिलाफ मोर्च खोला जाना कई मायनों में अहम् है। यह बात भी सनातन काल से कही जाती रही है की महिलाएं ही समाज सुधरने में मुख्या भूमिका निभाती रही हैं।
नशाखोरी के चलते अपराध में लगातार वृद्धि हो रहे हैं, यह बात भी प्रमाणित हो गई है। ऐसे में यदि सरकार नशाखोरी को रोकने पहल ना करे तो भला इसे क्या कहा जा सकता है। सरकार कहती है की आकारी ठेके से करोड़ों की आय होती है। हमारा कहना है की क्या लोगों के घरों तबाह करके कमाए गए रुपयों की कोई अहमियत रह जाती है। वैसे भी छत्तीसगढ़ में खनिज का अपार भण्डार है, लेकिन सरकार है की रायल्टी चोरी को रोकने कोई कदम नहीं उठती, लेकिन समाज को बर्बाद करने के लिए हर साल शराब की दूकान बढ़ाये जा रहे हैं। ऊपर से गांवों में जिस तरह से अवैध ढंग से शराब की बिकवाली होती है, उससे पूरी सरकार कटघरे में कड़ी नजर आती है। मगर अफसोस इस राज्य में विपक्ष में बैठी कांग्रेस के नेता इस मुद्दे को उठाने के बजाय मूकदर्शक बने बैठे हैं। ऐसे हालात में नारी शक्ति को ही जागरूक होकर नशाबंदी के खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी। नहीं तो अभी केवल घर तबाह हो रहे हैं, बाद में समाज का क्या स्थिति बनेगी, कहा नहीं जा सकता।
बुधवार, 19 अगस्त 2009
सपनों को मिले पंख
मन में सकारात्मक सोच हो और जीवन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो कोई भी काम मुस्किल नहीं होता। जब किसी का बेहतर मार्गदर्शन मिल जाए तो सफलता की राह और भी आसान हो जाती है।
ऐसा ही कुछ दिखाया है तमिलनाडु के ४७ वर्षीय श्री कठिरेसन जी ने। दो दसक पहले वे हैदराबाद के प्रतिरक्षा अनुसन्धान और विकास प्रयोग शाला में डॉ ऐ पी जे अब्दुल कलाम जी के ड्राईवर हुआ करते थे। बाद में देश के rashtrapati padको सुशोभित करने वाले जाने माने वैज्ञानिक की बातों से प्रेरित होकर उन्होंने पढ़ाई के क्षेत्र में एक ऐसा कृतिमान रच दिया। इसे जानकर देश वासी गर्व करता है। उनके इस प्रयास के बारे में जो भी सुनता या जनता है तो उनकी इस मेहनत व लगन की तारीफ किए बगैर नहीं रहता।
ड्राईवर का कम करते हुए महज कुछ ही पढ़ाई नहीं, बल्कि इतिहास जैसे विषय में पीएचडी की उपाधि ग्रहण करना, अपने आप में एक बड़ी बात है। कलाम साहब के विचारों से प्रभावित होकर उनहोंने जो प्रयास किया। ऐसा दुनिया में बहुत कम ही लोग कर पाते हैं। वैसे ही कलाम साहब के प्रति देश के हर व्यक्ति में सम्मान की भावना है। उनके विचारों के बदौत किसी की जिन्दगी बदल जाए। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।
आज वे ड्राईवर से एक अध्यापक बन गए हैं। आज वे जिस ऊंचाई तक पहुंचे हैं। यह हर उस व्यक्ति के लिए आंतरिक इच्छा शक्ति जागृत करने में सहायक है, जो हमेशा मन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना रखते हैं। वैसे हर व्यक्ति को कलाम साहब जैसे महान सख्शियत के ड्राईवर बनकर कर चलाने का मौका नहीं मिलता, लेकिन इतना जरूर है की कलाम साहब के विचारों से कैसे किसी जिन्दगी बदली है। यह इतिहास में दर्ज हो गया है। जो व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ना चाहता है, उनके लिए यह बार मायने रखेगी और नई पीढी को इससे निशिचित ही शिख मिलेगी।
मेरी ओर से ऐसे प्रेरणा को प्रणाम....
जो सपनों को पंख दे दे।
ऐसा ही कुछ दिखाया है तमिलनाडु के ४७ वर्षीय श्री कठिरेसन जी ने। दो दसक पहले वे हैदराबाद के प्रतिरक्षा अनुसन्धान और विकास प्रयोग शाला में डॉ ऐ पी जे अब्दुल कलाम जी के ड्राईवर हुआ करते थे। बाद में देश के rashtrapati padको सुशोभित करने वाले जाने माने वैज्ञानिक की बातों से प्रेरित होकर उन्होंने पढ़ाई के क्षेत्र में एक ऐसा कृतिमान रच दिया। इसे जानकर देश वासी गर्व करता है। उनके इस प्रयास के बारे में जो भी सुनता या जनता है तो उनकी इस मेहनत व लगन की तारीफ किए बगैर नहीं रहता।
ड्राईवर का कम करते हुए महज कुछ ही पढ़ाई नहीं, बल्कि इतिहास जैसे विषय में पीएचडी की उपाधि ग्रहण करना, अपने आप में एक बड़ी बात है। कलाम साहब के विचारों से प्रभावित होकर उनहोंने जो प्रयास किया। ऐसा दुनिया में बहुत कम ही लोग कर पाते हैं। वैसे ही कलाम साहब के प्रति देश के हर व्यक्ति में सम्मान की भावना है। उनके विचारों के बदौत किसी की जिन्दगी बदल जाए। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।
आज वे ड्राईवर से एक अध्यापक बन गए हैं। आज वे जिस ऊंचाई तक पहुंचे हैं। यह हर उस व्यक्ति के लिए आंतरिक इच्छा शक्ति जागृत करने में सहायक है, जो हमेशा मन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना रखते हैं। वैसे हर व्यक्ति को कलाम साहब जैसे महान सख्शियत के ड्राईवर बनकर कर चलाने का मौका नहीं मिलता, लेकिन इतना जरूर है की कलाम साहब के विचारों से कैसे किसी जिन्दगी बदली है। यह इतिहास में दर्ज हो गया है। जो व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ना चाहता है, उनके लिए यह बार मायने रखेगी और नई पीढी को इससे निशिचित ही शिख मिलेगी।
मेरी ओर से ऐसे प्रेरणा को प्रणाम....
जो सपनों को पंख दे दे।
शनिवार, 8 अगस्त 2009
शिवरीनारायण में होती है गंगा आरती
शिवरीनारायण के मट्ठ मन्दिर द्वारा फरवरी २००९ से गंगा महा आरती शुरू की गई है। माघी पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित होने वाले छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े मेले के समय यह गंगा आरती प्रारम्भ की गई थी। तब से लेकर अब तक आरती लगातार हो रही है। चाहे बारिस हो या फिर अंधड़ आए, किसी भी स्थिति में आरती कराइ जाती है। मट्ठ मन्दिर में रहने वाले साधू संतों के द्वारा यह जिम्मेदारी निभाई जाती है और वे अपने दायित्व को बखूबी निभा रहे हैं।
शिवरीनारायण में महा गंगा आरती की जो शुरुआत हुई है, ऐसा प्रयास प्रदेश में पहले कभी नहीं हो सका है। राज्य में गंगा आरती कराने की ऐसी परिपाटी शिवरीनारायण से शुरू हो सकी है। पिछले छः माह से रोज शाम को आरती हो रही है। शाम होते ही मट्ठ मन्दिर से साधू संतों की टोली निकलती है और वे सीधे बावा घाट पहुँचते हैं। इस महा आरती में शामिल होने दूर-दूर से लोग आते हैं और शिवरीनारायण की पुण्य धरा में पहुँच कर ख़ुद को धन्य महसूस करते हैं।
इस बारे में शिवरीनारायण मट्ठ मन्दिर के मठ धीस राजेश्री महंत रामसुंदर दास ने बताया की शिवरीनारायण भगवान् की कृपा से जो आरती शुरू की गई हैं, ऐसी परिपाटी छत्तीसगढ़ में नहीं हैं। केवल शिवरीनारायण में पहली बार यह प्रारम्भ हुई हैं। देश के बड़ी धार्मिक नगरी हरिद्वार, बनारस, काशी सहित कई धामों में यह आरती का सिलसिला लंबे से जरी हैं। उनका कहना हैं की शिवरीनारायण में जारी गंगा महा आरती अनवरत जारी रहे, ऐसी कामना हैं, जिससे नगर व भगवान् शिवरीनारायण का नाम देश में ही नहीं, वरन दुनिया में फैले।
इधर यह जानना भी जरुरी हैं की शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ शासन द्वारा पर्यटन स्थल घोषित किया गया हैं और यहाँ के विकास के लिए करोड़ों रूपये खर्च भी किए जा रहे हैं। हालाँकि इस धार्मिक नगरी का जो विकास की बातें कही गई थी, वह आज भी अधूरी हैं। यहाँ के नागरिकों की आस बंधी हैं की शिवरीनारायण का नाम पर्यटन व दर्शनीय स्थल को लेकर सितारे की तरह चमके।
मेरी भी यही कामना है।
भगवान् शिवरीनारायण हमेशा सदा कृपा करे।
जय भगवान् शिवरीनारायण.... सदा सहाय हो।
शुक्रवार, 7 अगस्त 2009
हम साथ-साथ हैं...
आज जिस ढंग से लोगों के विचारों में परिवर्तन आ रहा है और बदलते समय के स्वार्थी होते जा रहे हैं। लोग एक दूसरे के हितों के बारे में न सोचकर स्वहित के बारे में सोचते हैं। ऐसे में जिला मुख्यालय जांजगीर चाम्पा से १५ किमी दूर गाँव भडेसर में आम लोंगों के बजाय अजगर सांप कुछ ऐसा संदेश दे रहे हैं, जिससे आत्मीयता का भावः दिखाई देता है। यहाँ के निवासी महात्मा राम पाण्डेय के पुराने मकान के पास करीब डेढ़ सौ साल पुराना पीपल का पेड़ है। जहाँ एक ही पेड़ पर वर्षों से पच्चास से ज्यादा अजगर एक साथ रहते हैं। ये प्राणी लोगों को सिख दे रहे हैं की हम साथ- साथ हैं और भविष्य में भी उनका बसेरा यही रहेगा। सबसे बड़ी बात हैं की ये अजगरों ने अब तक किसी व्यक्ति नुकसान नहीं पहुचाया है।भडेसर के पीपल के पेड़ पर इतने खोखले हो चुके हैं की अजगर इन्हीं खोल में अपना आशियाना बनाकर रखे हुए हैं। अजगर आसपास के घरों में भी चले जाते हैं, लेकिन वे कुछ नहीं करते और घुमने के फिर वापस पेड़ के खोल में चले जाते हैं। यह सिलसिला लंबे समय से जरी है।
भडेसर निवासी श्री पांडे का कहना है की पेड़ में शुरुआत में एक-दो ही अजगर थे। बाद में प्रजनन के साथ ही आसपास गाँव में मिलने वाले अजगरों को यहीं लाया जाता है। एक पेड़ पर इतने सारे अजगरों को देखने लोंगों में कौतुहल का विषय होता है। जीवविज्ञानियों का कहना है की वातावरण मिलने से अजगर लंबे समय तक कहीं भी रूक सकता है, क्योंकि यह पालतू प्रजाति का जानवर होता है। आज की स्थिति में पेड़ पर पच्चास से भी ज्यादा अजगर हैं। जिसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।
ठण्ड के दिनों में अजगर जैसे ही धुप निकलती है, वैसे ही वे पेड़ के खोल से बहार निकलते हैं। बाकि मौसम एक-दो दिख जाए तो बहुत है। बरसात के समय प्रजनन काल होता है और इस दौरान अजगर सपोलों को जन्मा देते हैं।
यहाँ महत्व बात यह है की लोग जहाँ एक छत के निचे लंबे समय तक नहीं रह सकते। ऐसे में ये अजगर लोगों के लिए किसी मिसाल से कम नहीं है, क्योंकि वे वर्षों से एक साथ रह रहे है। अच्छी बात तो यह है की किसी दूसरे स्थान से पकड़कर लाये सांप भी जल्दी ही यहाँ के अनुकूल वातावरण में ढल जाता है।
भदेसर के इन अजगरों के बारे में लोग पहले सुनकर सिहर उठते हैं, लेकिन गाँव पहुँच कर देखने से यह समाज को संदेश देते नजर आते हैं, क्योंकि वे एक पेड़ पर वर्षों से रह रहे हैं, जबकि लोग अपनों के साथ एक छत के निचे साथ रहने परहेज करते हैं। ऐसे लोंगों के लिए ये अजगर मिसाल हैं, क्योंकि वे कहते हैं हम साथ-साथ हैं.....
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