शनिवार, 21 जून 2014

बगैर कोई कार्य किए ग्रहण नहीं करते ‘अन्न’

कहते हैं कि जब कोई बीमारी, शरीर को जकड़ती है तो फिर जीवन अंधकारमय हो जाता है और जीवन बोझ लगने लगता है, मगर इनसे परे बीमारी के बाद भी जिंदादिली दिखता है, चांपा इलाके के सोंठी आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों में। एक ओर जहां कुष्ठ पीड़ितों के समक्ष भिक्षावृत्ति के सिवाय, और कोई रास्ता नहीं रहता। ऐसी स्थिति से जूझते हुए आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों ने नई मिसाल पेष की और यह भी बताया कि कोई भी परिस्थिति आ जाए, लेकिन स्वाभिमान को जिंदा कैसे रखा जाए। यहां कुष्ठ पीड़ितों का मनोबल बढ़ाने में आश्रम प्रबंधन के योगदान की जितनी तारीफ की जाए, कम ही होगी।
जिला मुख्यालय जांजगीर से 15 किमी दूर सोंठी गांव में स्थित है कुष्ठ आश्रम। इस कुष्ठ आश्रम में 150 से अधिक कुष्ठ पीड़ित रहते हैं। इनमें से अधिकतर की उम्र 60 के पार जा पहुंची है, फिर भी इन कुष्ठ पीड़ितों में अपने कर्म के प्रति कर्मठता देखते ही बनती है। इनमें से अधिकांष कुष्ठ पीड़ित,  छत्तीसगढ़ के ही हैं। कइयों को आश्रम में रहते 25 से 30 साल हो गए हैं। आश्रम में रहने वाले कुष्ठ पीड़ितों के बीच आपस में इतना अपनत्व है कि वे एक-दूसरे के सहयोग के लिए हमेषा आतुर नजर आते हैं। भाई-बंधुत्व की भावना आश्रम में साफ नजर आती है, जिसके कारण कुष्ठ पीड़ितों का मन, इस आश्रम में रमा हुआ है।
खास बात यह है कि आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों ने स्वाभिमान की मिसाल पेष की है। दरअसल, कुष्ठ पीड़ितों में चाहे वह पुरूष हो या महिला, सभी कुछ न कुछ कार्य जरूर करते हैं और इस तरह वे बगैर कोई कार्य किए, अन्न ग्रहण नहीं करते। हर सुबह कुष्ठ पीड़ितों में यही परिपाटी नजर आती है और यह सिलसिला कोई दो-चार साल पुरानी नहीं है, बल्कि जब से आश्रम शुरू हुआ है, तब से कुष्ठ पीड़ित अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य करते आ रहे हैं।
आश्रम में कुछ महिला कुष्ठ पीड़ित, जहां चावल में कंकड़ बिनने का काम करती हैं तो कुछ जैविक खाद बनाने में योगदान देती हैं। साथ ही कई महिलाएं, आश्रम की गौषाला में काम करती हैं। इसके साथ ही आश्रम में कोई चाक बनाता है तो कोई दरी। महत्वपूर्ण बात यह है कि रसोई की जिम्मेदारी भी कुष्ठ पीड़ित महिलाएं संभालती हैं। यह कुष्ठ पीड़ितों की रोज की दिनचर्या में शामिल है और कुछ न कुछ काम करने के बाद, कुष्ठ पीड़ितों के चेहरों में एक आत्मसंतोष भी दिखता है। 
कुष्ठ पीड़ित मानते हैं कि रोजाना कोई न कोई काम करने से शरीर को फायदा है ही, साथ ही आश्रम का काम भी हो जाता है। साथ ही आश्रम के विकास में उनका योगदान भी शामिल हो जाता है। आश्रम की व्यवस्था से सभी कुष्ठ पीड़ित खुष नजर आते हैं और वे आश्रम के सुखद माहौल से काफी आषान्वित नजर आते हैं।
सोंठी कुष्ठ आश्रम के सुधीर जी कहते हैं कि आश्रम में परिवार का माहौल है। ऐसी परंपरा की शुरूआत संस्था के संस्थापक स्व. सदाषिव गोविंद कात्रे जी ने की थी। परिवार की भावना होने के कारण सभी को लगता है कि यह मेरा है और उसी पारिवारिक भावना के कारण सभी लोग, अपना कुछ न कुछ योगदान देना चाहते हैं। सभी के लिए व्यवस्थाएं एक जैसी हैं। जो आश्रम में रह रहे हैं, वही लोग यहां की व्यवस्थाओं को संभाल रहे हैं।
निष्चित ही, सोंठी आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों ने समाज के सामने अपने स्वाभिमान को जिस तरह जीवंत बना रखा है, वह समाज की सबसे बड़ी बुराई भिक्षावृत्ति पर तमाचा है। कई कुष्ठ पीड़ित, धार्मिक जगहों और फुटपाथों पर भिक्षावृत्ति को अपनी किस्मत समझते हैं, उन्हें सोंठी आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों से सीखने की जरूरत है। साथ ही समाज के लोगों को भी कुष्ठ पीड़ितों के मनोबल को बढ़ाने के लिए आगे आना होगा, तब कहीं जाकर कुष्ठ रोग के प्रति,  समाज में व्याप्त संकीर्ण मानसिकता भी खत्म होगी।

समाज की मुख्यधारा से जुड़ने लगे कुष्ठ पीड़ित
समाज में कुष्ठ रोगियों के लिए मानसिकता अच्छी नहीं रही है। षिक्षा और जागरूकता के बाद अब कुष्ठ पीड़ितों के प्रति धारणा बदली है। यही वजह है कि कुष्ठ पीड़ित भी अब समाज की मुख्यधारा से जुड़ने लगे हैं। कुष्ठ पीड़ितों के उत्थान में सोंठी के आश्रम प्रबंधन ने बड़ी भूमिका निभाई है, जिसका परिणाम अब सबके सामने हैं। जिन कुष्ठ पीड़ितों को लाचार समझा जाता था, वे आश्रम में ऐसे-ऐसे कार्य करते हैं, जिसे देख और सुनकर सहसा विष्वास नहीं होता। कात्रे जी ने जो बुनियाद डाली थी, उसे गणेष दामोदर बापट ने मजबूत करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है। जिसके कारण आज कुष्ठ पीड़ितों का आत्मबल और स्वाभिमान बढ़ा नजर आता है।
कुष्ठ रोग को ‘साध्य’ मानकर अक्सर लोग, कुष्ठ रोगियों से दूरी बनाते थे, लेकिन षिक्षा के प्रसार और जागरूकता ने लोगों की सोच में काफी बदलाव किया है। हालांकि, कुष्ठ पीड़ितों को समाज में वह सम्मान नहीं मिल रहा है, जितना उन्हें मिलना चाहिए। बावजूद, कुष्ठ रोगियों ने इन स्थितियों से मुकाबला करते हुए अपने जीवन के लिए नया रास्ता तैयार किया है। कुष्ठ पीड़ितों ने ठाना है कि वे किसी पर बोझ नहीं बनेंगे और यही वजह है कि सोंठी आश्रम के कुष्ठ पीड़ित, अनेक कार्यों में पारंगत हो गए हैं।
सोंठी आश्रम में रहने वाले कुष्ठ पीड़ित, दरी से लेकर चाक और जैविक खाद बनाते हैं। इसके अलावा गौषाला की देखरेख के अलावा हॉलर मिल भी आश्रम में रहने वाले कुष्ठ रोगी ही चलाते हैं। साथ ही आश्रम के लोगों के कपड़ों की सिलाई करने वाला व्यक्ति भी कुष्ठ पीड़ित ही है,  इन कुष्ठ रोगियों के जज्बे के आगे सामान्य लोगों के भी पसीने छूट जाए।
आश्रम में 20 साल से रह रहे जगदीष श्रीवास बताते हैं कि वे दरी बनाने का काम करते आ रहे हैं। आश्रम का माहौल, घर जैसा ही है। यहां तक कि घर से भी अच्छा है। आश्रम में पूरा सम्मान मिलता है।
इसी तरह आश्रम में चाक बनाने वाले दयाराम यादव कहते हैं कि सभी कुष्ठ पीड़ित अपने-अपने स्तर पर काम करते हैं। हम लोग चाक बनाते हैं। बारिष के बाद चाक बनाना बंद हो जाएगा। इसके बाद सीमेंट की बोरी के धागे से रस्सी बनाने का काम करते हैं।
टेलरिंग का काम करने वाले विनोद नायक को आश्रम, घर के समान ही लगता है। सभी लोग परिवार के सदस्य लगते हैं और सबसे पारिवारिक रिष्ता हो गया है। विनोद बताते हैं कि आश्रम में काम करने से शरीर में स्फूर्ति रहती है। इलाज तो निरंतर जारी रहता है।
आश्रम में रहने वाली कुष्ठ पीड़ित महिलाएं भी अपना योगदान देने में कहीं भी पीछे नहीं है। कुछ महिलाएं जहां चावल बिनती हैं या फिर गौषाला से गोबर उठाती हैं, वहीं एक महिला हैं, गणेषी बाई, जो आश्रम में बनने वाली जैविक खाद की जिम्मेदारी संभालती हैं। जैविक खाद बनाने के लिए वह रोजाना कुछ न कुछ कार्य करती हैं और उसके साथ 2 अन्य महिलाएं भी काम करती हैं। इस तरह गोबर और गीले कचरे से खाद बनाई जाती है।
सोंठी कुष्ठ आश्रम के सुधीर जी कहते हैं कि सभी अपनी क्षमता के हिसाब से कार्य करते हैं, आश्रम में कोई बाध्य नहीं है। कुछ नहीं कर पाते, वह भी आश्रम परिसर की साफ-सफाई कर देते हैं। कई कुष्ठ पीड़ित हैं, जो भगवान की भक्ति में रमे रहते हैं।
सोंठी आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों ने तमाम झंझावतों और सामाजिक दूरियों के बाद भी अपने स्वाभिमान का जो दमखम दिखाया है, वह निष्चित ही बड़ी बात है। जिन कुष्ठ पीड़ितों को समाज द्वारा आत्मबल देना चाहिए, वही समाज कहीं न कहीं, उनसे दूर नजर आता है, फिर भी कुष्ठ पीड़ितों ने इन बातों को भुलकर सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया है। साथ ही खुद की क्षमता का पूरा उपयोग करते हुए आश्रम को भी आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया है।

स्व. सदाषिव गोविंद कात्रे जी का अहम योगदान
चांपा इलाके के सोंठी गांव में भारतीय कुष्ठ निवारक संघ की स्थापना करने वाले सदाषिव गोविंद कात्रे, खुद भी कुष्ठ से पीड़ित थे। यही वजह रही कि उन्होंने कुष्ठ पीड़ितों के दर्द को समझा और 1962 में कुष्ठ आश्रम की शुरूआत की। छह दषक पहले कुष्ठ पीड़ितों को दर्द को हरने को जो कोषिषें की गई थीं, निष्चित ही काफी हद तक कामयाबी मिली है। कुष्ठ पीड़ितों के लिए कात्रे जी ने अपना जीवन समर्पित कर दिया, जिन्हें आज भी आश्रम में रहने वाले कुष्ठ पीड़ित याद करते हैं। वर्तमान में गणेष दामोदर बापट की देखरेख में आश्रम का संचालन हो रहा है।
छह दषक पहले कुष्ठ पीड़ितों को हेय की दृष्टि से देखा जाता था और कुष्ठ को ‘साध्य’ रोग मानकर कुष्ठ पीड़ितों से हर कोई दूरियां बनाता था। 1960 में जब कात्रे जी चांपा आए तो कुष्ठ पीड़ितों की दुर्दषा देखकर उन्होंने भारतीय कुष्ठ निवारक संघ की स्थापना की और कुष्ठ पीड़ितों की सेवा में लग गए। शुरूआत में 2-3 कुष्ठ पीड़ित ही कात्रे जी के साथ रहते थे। इस दौरान कात्रे जी स्वयं साइकिल से गांव-गांव जाते और लोगों से एक मुट्ठी चावल सहयोग मांगते। साथ ही कुष्ठ के प्रति लोगों के भ्रम को भी दूर करने की कोषिष करते। इसी बीच कात्रे जी के परिश्रम और दृढ़ इच्छा शक्ति को देखकर एक समाजसेवी ने आश्रम निर्माण के लिए एक एकड़ जमीन, झोपड़ी और कुंआ दान किया। इस तरह आश्रम का संचालन शुरू हुआ और फिर आश्रम के कुष्ठ पीड़ितों के सहयोग के लिए बहुत से हाथ आगे आए। खास बात यह है कि कात्रे जी गांव-गांव, जब जाते तो लोग उनकी सराहना करते, लेकिन कुछ लोग सामाजिक बेड़ियों के चलते सहयोग नहीं कर पाते थे। धीरे-धीरे ऐसे लोग भी कुष्ठ पीड़ितों की मदद के लिए सामने आए। जिसका परिणाम है कि कुष्ठ पीड़ितों के प्रति जहां लोगों की सोच में काफी बदलाव आया है और साथ ही चिकित्सा ज्ञान बढ़ने से कुष्ठ रोग ‘असाध्य’ होने की भी जानकारी सामने आई।
उधर आश्रम में जैसे-जैसे कुष्ठ पीड़ितों की संख्या बढ़ती गई, वैसे-वैसे आश्रम में भी विकास के काम होते गए। इसी वक्त कुष्ठ पीडितों ने ही आश्रम के किनारे एक तालाब की खोदाई की, जिसे आज ‘माधव सागर’ के नाम से जाना जाता है। दूसरी ओर आश्रम के संस्थापक रहे स्व. सदाषिव गोविंद कात्रे के संस्मरण में समाधि स्थल का भी निर्माण किया गया है। समाजसेवा के लिए दिए गए कात्रे जी के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। वर्तमान में गणेष दामोदर बापट पर आश्रम के संचालन की जिम्मेदारी है। उन्होंने भी कुष्ठ पीड़ितों के हितों के लिए काम करने में ता-उम्र गुजार दी। उम्र के अंतिम पड़ाव के बाद भी बापट जी आज भी कुष्ठ पीड़ितों की सेवा में लगे हुए हैं।
सोंठी आश्रम के सुधीर कहते हैं कि कात्रे जी स्वयं कुष्ठ से पीड़ित थे, इसलिए वे कुष्ठ पीड़ितों के दर्द को जानते थे। कुष्ठ पीड़ितों के लिए पेट भरने के लिए ‘भिक्षावृत्ति’ एक ही रास्ता था। कात्रे जी चाहते थे कि कुष्ठ रोगी भिक्षावृत्ति से दूर हो और स्वाभिमान से जीए।
सोंठी आश्रम के सुधीर जी मानते हैं कि कुष्ठों के उत्थान और आश्रम को अग्रसर करने में समाज का बड़ा योगदान है। प्रारंभ में ही समाज के लोगों ने कात्रे जी को संबल दिया। कात्रे जी को एक मुट्ठी चावल के साथ हर महीने 1 रूपये सहयोग देते थे। समाज के बल पर ही आश्रम ने यह रूप हासिल किया है। शासन से भी मदद मिलती है।
सोंठी के भारतीय कुष्ठ निवारक संघ द्वारा कुष्ठ पीड़ितों की सेवा के अलावा सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन किया जाता है। आश्रम परिसर में कई साल नेत्र षिविर लगाए गए, जहां हजारों लोगों को लाभ हुआ है। इसके साथ ही षिक्षा के क्षेत्र में भी भारतीय कुष्ठ निवारक संघ महती भूमिका निभा रहा है। आश्रम के पिछले हिस्से में सुषील विद्या मंदिर संचालित है, जहां कक्षा 8 वीं तक के बच्चे पढ़ाई करते हैं। अहम बात यह है कि आश्रम के अंतर्गत सुषील बालक छात्रावास भी है, जहां छग के अलावा मध्यप्रदेष, पष्चिम बंगाल और झारखंड के बच्चे भी पढ़ते हैं। बालक छात्रावास में 74 बालक हैं, जिनमें 40 बच्चे ऐसे हैं, जो कुष्ठ पीड़ितों के परिवार के हैं। अन्य बच्चे गरीब परिवार के हैं। आश्रम द्वारा 1986 में सुषील बालक छात्रावास को शुरू किया गया था और इस संस्थान को कुष्ठ पीड़ितों के परिवार के उत्थान के लिए शुरू किया गया था, जो आज भी अनवरत जारी है।
कुष्ठ पीड़ितों के स्वास्थ्य की भी भारतीय कुष्ठ निवारक संघ को शुरू से ही चिंता रही है, जिसके कारण आश्रम परिसर में ही एक हॉस्पिटल खोला गया है, जहां हर दिन कुष्ठ पीड़ितों का इलाज होता है। जिन कुष्ठ पीड़ितों की समस्या बड़ी होती है, उनके इलाज के लिए बीच-बीच में दूसरे शहरों से भी विषेषज्ञ डॉक्टर पहुंचते हैं। इस तरह आश्रम में कुष्ठ पीड़ितों के जीवन को संवारने के लिए हर स्तर पर प्रयास हो रहा है, जिसकी बानगी आश्रम में पहुंचते ही देखने को मिलती है।

सोमवार, 16 जून 2014

देश के लिए ‘कर्ज’ चुकाने का शुरूर, खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

भारतीय रिजर्व बैंक के आर्थिक आय-व्यय के सर्वे में खुलासा हुआ है कि भारत के हर नागरिक पर 33 हजार का कर्ज है और जन्म लेते ही हर व्यक्ति 33 हजार रूपये के कर्ज तले दबा रहता है। इतना जरूर है कि कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष तौर पर कर्ज नहीं लिया रहता, मगर देश के नागरिक होने के कारण हर व्यक्ति पर स्वाभाविक तौर पर ‘कर्ज’ होना, माना जा सकता है।
जिले के विकास मिश्रा ने देष हित में अपने कंधे से कर्ज उतारने का प्रयास शुरू किया है और उन्होंने प्रधानमंत्री राहत कोष में 33 हजार का चेक भी भेजा है। फिलहाल, इस दिषा में किसी तरह की पहल नहीं हो सकी है। यही वजह है कि विकास मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और इस मसले पर विचार करने, कोर्ट में रिट पिटीषन अपने अधिवक्ता के माध्यम से दायर किया है।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी की गई सर्वे रिपोर्ट के मीडिया में प्रकाषित होने के बाद, जांजगीर इलाके के सिवनी गांव निवासी विकास मिश्रा ने तय किया कि प्रत्येक व्यक्ति पर 33 हजार का जो कर्ज बताया जा रहा है, उसे वह देश हित में अपने कंधे से उतारेगा। विकास ने दो साल पहले यानी 09 जनवरी 2012 को भारतीय स्टेट बैंक जांजगीर शाखा से 33 हजार रूपये का चेक प्रधानमंत्री राहत कोष के नाम से जारी कर कलेक्टोरेट में आवदेन के साथ जमा किया है। उसी दौरान एक पत्र के माध्यम से विकास को बताया गया कि उनके आवेदन और चेक को भेज दिया गया है, लेकिन इतना वक्त गुजरने के बाद भी अभी तक प्रधानमंत्री राहत कोष में भेजे गए चेक के बारे में कुछ पता नहीं चल सका है।
विकास मिश्रा का यह पहला प्रयास नहीं था, इससे पहले विकास ने देष के कई नेताओं समेत वित्त मंत्री और राष्ट्रपति को चेक भेजा, लेकिन कुछ नेताओं ने जवाब दिया और कुछ ने जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझा। विकास को राष्ट्रपति और वित्तमंत्री का भी जवाब नहीं मिला और न ही, चेक वापस आया। इस दौरान विकास ने कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, तत्कालीन केन्द्रीय राज्यमंत्री डॉ. चरण दास महंत, क्षेत्रीय सांसद कमला देवी पाटले और जिले के तत्कालीन प्रभारीमंत्री दयालदास बघेल को पत्र भेजकर पहल करने की फरियाद की। इसमें मोतीलाल वोरा का जवाब आया और उन्होंने विकास को प्रधानमंत्री राहत कोष में चेक भेजने की सलाह दी।
कुछ लोगों ने भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रिपोर्ट जारी करने के कारण चेक आरबीआई को भेजने की सलाह दी तो विकास ने 33 हजार का चेक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नाम से प्रेषित किया। खास बात यह है कि विकास के पत्र का जवाब देते हुए आरबीआई ने विकास मिश्रा के प्रयास की सराहना की। हालांकि, आरबीआई ने कर्ज मुक्ति के लिए भेजे जा रहे चेक के लिए उपयुक्त कार्यालय से पत्राचार करने की बात कही।
फिलहाल, विकास मिश्रा का मकसद अधूरा है, परंतु वह जी-जान से देष हित में अपने कंधे से ‘कर्ज’ उतारने की कोषिष में लगा है। विकास के मन में एक तरह से शुरूर सवार है कि जैसे भी करके हिन्दुस्तान के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते उन्हें ‘कर्ज’ उतारना ही है। विकास, इसे अपना सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य मानकर अनवरत कर्ज मुक्ति के लिए लगे हुए हैं।

रिपोर्ट ने विकास को झकझोरा...
देष में नागरिकों पर कर्ज की रिर्पार्ट कई बार मीडिया में आती रही है, लेकिन यही रिपोर्ट विकास मिश्रा ने देखी और उन्हें इस रिपोर्ट ने झकझोर कर रख दिया और उन्होंने ठाना कि वे अपने हिस्से का कर्ज उतारेगा।
विकास, अफसरों के दफ्तरों के चक्कर काट रहा है कि वह उस ऋण से उऋण होना चाहता है, जिसे उसने खुद उधार नहीं लिया है। देश का एक जिम्मेदार बासिंदा होने के कारण उन्होंने तय किया कि वह हर हाल में अपना फर्ज निभाएगा और देश के ‘कर्ज’ को खत्म करने बीड़ा उठाया है। इस तरह वह दो साल से हर कहीं चक्कर काट रहा है, किन्तु उसका 33 हजार का चेक लेने, कोई तैयार नहीं है।
मीडिया में रिपोर्ट देखने के बाद विकास ने कर्ज उतारने का मन बनाया। वे तय नहीं कर पा रहे थे, कर्ज उतारने के लिए राषि किसे भेजा जाए ? इसके बाद विकास ने कलेक्टर से भेंट की और भारत सरकार को भेजने के लिए 33 हजार का चेक सौंप दिया। इस दौरान विकास ने सीएम डॉ. रमन सिंह से भी मुलाकात की थी, किन्तु अब भी विकास को कर्ज मुक्ति का इंतजार है। विकास ने कई जगहों पर चेक भेजा, लेकिन अधिकांष वापस आ गए।
दूसरी ओर कई लोग ऐसे हैं, जो उनकी मंशा को नहीं समझ रहे हैं। विकास मिश्रा के इस तरह के नायाब प्रयास की प्रशंसा ही की जा सकती है, क्योंकि इस तरह की कोशिश देश भर में हो और हर नागरिक इसी मंशा से काम करे तो देश, कर्ज से मुक्त हो जाएगा। विकास मानते हैं कि देष में आने वाले दिनों में व्यापक असर होगा, क्योंकि बहुत से लोग हैं, जो देष में कर्ज उतारने के लिए आतुर हैं।
यह सही है कि विकास की कोषिष यदि रंग लाती है तो सिवनी गांव के अलावा इलाके के और भी युवा हैं, जो चाहते हैं कि देष के लिए वे भी अपने कंधे से कर्ज उतारेंगे। साथ ही ये युवा, विकास के प्रयास की सराहना करते नहीं थकते और उन्हें विष्वास है कि आने वाले दिनों में विकास को सफलता मिलेगी।
देश का कर्ज उतारने का शुरूर लिए, विकास मिश्रा भटक रहे हैं, उन्हेें समझ भी नहीं आ रहा है, वे क्या करें ? बस, वे खुद को कर्ज से मुक्त करना चाहते हैं। विकास मिश्रा कहते भी हैं कि इस तरह के प्रयास वे कर रहे हैं, इसके बाद उन्हें आशा है कि और भी लोग आगे आएंगे।

रिट पिटीषन दायर, विचाराधीन
विकास मिश्रा पूरे दमखम के साथ देश के नाम खुद के कर्ज को उतारने में हर स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। इतना जरूर है कि उन्हें किसी प्रशासनिक अधिकारी या जनप्रतिनिधि का सहयोग नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि विकास मिश्रा ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। विकास ने ‘कर्ज मुक्ति’ के लिए अपने अधिवक्ता के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में रिट-पिटीषन दायर किया है। फिलहाल, मामला विचाराधीन है।
ये अलग बात है कि अफसर, विकास मिश्रा के सहयोग के लिए सीधे तौर पर आगे नहीं आ रहे हैं, मगर देश के प्रति उनके समर्पण और जुनून की तारीफ किए बगैर नहीं पा रहे हैं। आम लोग भी उनकी कोशिश की सराहना कर रहे हैं और इस तरह की मिसाल, देश के हर नागरिक को पेश करने की बात भी उठने लगी है। छोटे से गांव सिवनी से शुरू हुआ यह प्रयास, दिल्ली के गलियारों तक पहुंच गया है।
विकास को अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार है। विकास को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर पूरा भरोसा है और उन्हें आस भी है कि देष हित में कोई बड़ा निर्णय होगा। उनके मुताबिक, देष का यह अनूठा मामला है। अपने आप में देष का यह पहला प्रयास है।
विकास मिश्रा कहते हैं कि यह प्रयास, देष के नागरिकों को संदेष देने का है और देष को कर्ज से मुक्त किया जाए। सरकार गलत नीतियां बना रही है। भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। देष की अर्थव्यवस्था बिगड़ रही है। देष को सुचारू तौर चले, बस यही प्रयास है। देष की 50 फीसदी से अधिक आबादी गरीब है, ऐसे में सरकार ऐसी नीतियां बनाए, जिससे देष का कोई भी नागरिक कर्जदार न हों।
विकास मिश्रा ने जिस तरह से अनूठा प्रयास किया है और करोड़ों भारतीयों को जोड़ने की कोशिश हुई है। देश के ‘कर्ज’ को चुकाने की सोच ने, टैक्स चोरी करने वाले उन लोगों पर तमाचा जड़ा है, जो देश हित को दरकिनार कर विकास कार्य को अवरोध करने के लिए टैक्स चोरी करते हैं। निश्चित ही इस पहल के बाद लोगों में जागरूकता आएगी और देश के प्रति सेवा भावना भी जागृत होगी।

परिवार और दोस्तों से मिला संबल
देष के लिए कर्ज से मुक्ति के लिए की जा रही विकास मिश्रा की कोषिष को परिवार के समर्थन से भी बल मिल रहा है। विकास द्वारा कर्ज चुकाने के कार्य में परिवार के सभी लोग साथ हैं, वहीं विकास के दोस्तों ने भी उसका उत्साह हमेषा बढ़ाया है।
देष की आबादी करीब ढाई अरब पहुंच गई है और भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट से पता चलता है कि देष का प्रत्येक नागरिक 33 हजार हजार के कर्ज से डूबा है। ये अलग बात है कि प्रत्यक्ष तौर पर देष के किसी व्यक्ति ने खुद कर्ज नहीं लिया है, किन्तु देष में जो कर्ज है, वह कहीं न कहीं, अवाम पर ही बोझ है। ऐसे में कोई इन ढाई अरब लोगों में से निकलकर अपने कंधे से देष के लिए कर्ज उतारने के बारे में सोचे तो, इस मंषा का स्वागत होना चाहिए।
विकास मिश्रा ने दो साल पहले आरबीआई की रिपोर्ट देखकर देष हित में खुद के कर्ज को उतारने का ठाना है और वह इसमें कटिबद्ध भी नजर आ रहा है। विकास को उसके परिवार के लोगों को भरपूर सहयोग मिल रहा है। यही कारण है कि बिना थके-बिना रूके, पूरे उत्साह से कर्ज मुक्ति की कोषिषों में कोई कमी नहीं कर रहे हैं। यहां तक विकास ने मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया है।
विकास बताते हैं कि परिवार में चार सदस्य हैं, कर्ज के बारे में बताया तो सभी लोगों ने कर्ज मुक्ति का समर्थन किया। सभी चाहते हैं कि देष के नाम पर कर्ज उतारने का प्रयास जारी रहे।
विकास के छोटे भाई ओमप्रकाष मिश्रा कहते हैं कि परिवार का पूरा सहयोग है और वे मदद भी कर हैं। उन्हें अफसोस है कि देष हित में किए जा रहे प्रयास को भी न तो अफसर मदद कर रहे हैं और न ही, जनप्रतिनिधि। 
विकास मिश्रा ने निष्चित एक बेहतर प्रयास किया है। अब देखने वाली बात होगी कि देश के नाम ‘कर्ज’ को उतारने के लिए यह कारवां, और कितना आगे बढता है। इतना जरूर है कि विकास मिश्रा ने अपने दायित्व का परिचय तो दे दिया है, अब बारी हम सब की है।

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

सेवा की मिसाल ‘नारायण सेवा समिति’

जांजगीर-चांपा ( छत्तीसगढ़ ) के षिवरीनारायण की नारायण सेवा समिति, ‘मानव सेवा’ की मिसाल बन गई है। षिवरीनारायण में माघी पूर्णिमा से हर साल शुरू होने वाले प्राचीन मेले में हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं को नारायण सेवा समिति द्वारा प्रसाद स्वरूप भोजन कराया जाता है। भूखे व्यक्तियों की सेवा को ‘नारायण सेवा’ मानकर यह परिपाटी शुरू की गई थी, जो 16 बरसों से जारी है। हर साल 10 हजार से अधिक श्रद्धालु भोजन करते हैं। लोट मारकर भगवान नर-नारायण के दर्षन के लिए पहुंचने वाले भक्तों को दो दिनों तक भोजन कराया जाता है। इसकी सफलता के लिए कई समाजसेवी के साथ ही, स्कूली छात्र-छात्राएं जुटे रहते हैं।
नारायण सेवा समिति के अध्यक्ष राजेष अग्रवाल का कहना है कि 1998 में षिवरीनारायण के कुछ समाजसेवी अमरनाथ यात्रा पर गए थे। इस दौरान वहां दूरस्थ इलाकों से भगवान के दर्षन करने पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को भोजन कराने की परिपाटी की जानकारी मिली। इसके बाद षिवरीनारायण में भी इस परिपाटी को माघी पूर्णिमा के अवसर पर शुरू की गई, जो आज भी जारी है। नारायण सेवा समिति के कई सदस्य दो दिनों तक पूरी तन्मयता के साथ जुटे रहते हैं, वहीं षिवरीनारायण के कई उत्साही युवक भी समाजसेवा की भावना से लबरेज होकर भोजन परोसने से लेकर श्रद्धालुओं की अन्य सेवा में जुटे रहते हैं। लोट मारकर मंदिर के पट तक पहुंचने वाले लोगों को भोजन का कूपन दिया जाता है और उन्हें पास ही भोजन स्थल की जानकारी दी जाती है। इस तरह भगवान ‘नर-नारायण’ के दर्षन के बाद श्रद्धालु, भोजन प्राप्त करने पहुंचते हैं।  
माघी पूर्णिमा से शुरू होने वाले षिवरीनारायण मेले की पहचान काफी प्राचीन है। अविभाजित मध्यप्रदेष के समय से ही षिवरीनारायण का 15 दिवसीय मेला, सबसे बड़ा मेला रहा है। छग के निर्माण के बाद भी षिवरीनारायण मेले की वही पहचान आज भी कायम है। महाषिवरात्रि तक मेले में रोजाना लाखों की संख्या में भीड़ जुटती है। षिवरीनारायण की महत्ता इसलिए भी है कि इस धार्मिक नगरी को पुरी के भगवान जगन्नाथ का ‘मूल स्थान’ माना जाता है और किवदंति है कि भगवान जगन्नाथ, माघी पूर्णिमा को एक दिन षिवरीनारायण में विराजते हैं, इसलिए भगवान के दर्षन के लिए भक्तों को सैलाब उमड़ पड़ता है। माघी पूर्णिमा पर चित्रोत्पला महानदी के त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद श्रद्धालु, भगवान नर-नारायण के दर्षन करने पहुंचते हैं। हजारों भक्त ऐसे होते हैं, जो भगवान के द्वार तक लोट मारते पहुंचते हैं और आषीर्वाद प्राप्त करते हैं। खास बात यह भी रहती है कि दूर-दूर से लोट मारकर आने वाले भक्तों के चेहरों में थकान कहीं नजर नहीं आती, इसे वे भगवान की कृपा ही मानते हैं।

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

लघुकथा - जीवन पथ

मैं जिस शहर में रहता हूं, वहां एक नेत्रहीन व्यक्ति है। वे पूरे शहर में खुद ही एक डंडे के सहारे कहीं भी चले जाते हैं। उन्हें इस तरह ‘जीवन पथ’ पर आगे बढ़ते बरसों हो गया। उनकी जिजीविषा देखकर हर कोई हतप्रद रह जाता है। यह तो हम सब कहते रहते हैं कि बेसहारे को सहारे की जरूरत होती है, मगर यह नेत्रहीन व्यक्ति ऐसी सोच रखने वालों के लिए मिसाल है। दरअसल, पिछले दिनों नेत्रहीन व्यक्ति शहर के चौक से गुजर रहा था, इसी दौरान उन्हें सड़क किनारे से आवाज आई कि कोई उसे सड़क पार करा दे। इससे पहले कोई उस असहाय व्यक्ति को पार लगाने आता, उससे पहले ही नेत्रहीन व्यक्ति ने स्वस्फूर्त पहल करते हुए उसे दूसरी छोर पहुंचाया। कथा का तात्पर्य यही है कि किसी को असहाय नहीं समझना चाहिए, मगर जो मदद की अपेक्षा रखते हैं, उन्हें सहायता देने हर समय तैयार रहना चाहिए। ऐसे में नेत्रहीन व्यक्ति का प्रयास निःसंदेह संस्मरणीय है। इससे निश्चित ही सीख मिलती है। यह भी समझ मंे आती है कि यही सबसे बड़ा ‘जीवन पथ’ है।

सोमवार, 21 नवंबर 2011

पीपल पर अजगरों का बसेरा !

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के भड़ेसर गांव के एक पुराने पीपल पेड़ में सौ से अधिक अजगरों का बसेरा है, वहीं आसपास लोगों के घर भी हैं, परंतु इन सर्पों ने आज तक किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। इनकी इस विशेष प्रवृत्ति और धार्मिक मान्यता को लेकर ग्रामीण पूजा-अर्चना भी करते हैं। एक पेड़ पर इतनी संख्या में अजगरों को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं और जो भी यह बात जानते हैं, उनके बीच यह कौतुहल का विषय हो जाता है। अभी ठंड शुरू होने के साथ ही अजगरों ने पेड़ की खोह से निकलना शुरू कर दिया है। लिहाजा अजगर देखने पहुंचने वाले लोगों का उत्साह देखते ही बनता है।
जिला मुख्यालय जांजगीर से 15 किमी दूर ग्राम भड़ेसर निवासी महात्मा राम पांडे के खलिहान में सौ साल से भी अधिक पुराना पीपल का पेड़ हैं। यहां पांच दशक से अधिक समय से अजगर जमे हुए हैं। पहले इस पेड़ के खोखर में कुछ ही अजगर थे, लेकिन अब इसकी संख्या में वृहद रूप से इजाफा हुआ है और अजगरों की संख्या अब सौ से अधिक पहुंच गई है। 55 वर्षीय श्री पांडे ने बताया कि जहां पीपल का पेड़ है, वहां पहले उनके परिवार के लोग नहीं रहते थे। दस वर्ष पहले ही पेड़ के पास बने मकान में आकर रहने लगे हैं। इतने वर्षों में उन्होंने अजगरों को कुछ भी खाते नहीं देखा है। हां, तालाब में अजगर रात में विचरण करते हैं। उन्होंने बताया कि अजगरों ने कभी किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया है। पशु-पक्षी व अन्य जानवर पेड़ के आसपास बैठे रहते हैं, लेकिन उन्हें भी अजगर कुछ नहीं करते। वे बताते हैं कि पेड़ के पास दर्जन भर से अधिक मकान हैं और कई खलिहान हैं। यहां अजगर कभी दिन में तो कभी रात में विचरण करते देखे जाते हैं श्री पांडे ने बताया कि पीपल का पेड़ पूरी तरह से खोखला हो गया है और अजगर पेड़ के इस किनारे से निकलते हैं तो कभी उस किनारे से। पहले से अब संख्या बढ़ती जा रही है। शुरूआत में एक-दो ही थे। बाद में पचास से अधिक हो गए और अब यह आंकड़ा सौ को भी पार कर गया है। आसपास गांवों मंे अजगर मिलने पर उसे भी लाकर पेड़ पर रख दिया जाता है। जिसे पेड़ पर पहले से रह रहे अजगर अपना लेते हैं। अजगरों का यह अपनत्व भी लोगों को सोचने पर विवश कर देता है।
भड़ेसर के बुजुर्ग ग्रामीणों का कहना है कि जब से वे जानने-समझने लायक हुए हैं, तब से इस पेड़ पर अजगरों को देखते आ रहे हैं। अजगर, गांव में घूमते रहते हैं और नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं करते। यही कारण है कि लोग, अजगरों को बहुत नजदीक से देखते हैं। वे यह भी बताते हैं कि अजगरों को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। जिले के अलावा छग के अन्य जगहों से भी लोगों का आना होता है और पेड़ पर अजरों का बसेरा देख, वे भौंचक रह जाते हैं। उन्हें सहसा विश्वास ही नहीं होता कि एक साथ इतने अजगर कैसे रह सकते हैं। वैसे सभी अजगर एक साथ नहीं दिखते। बारी-बारी खोखर से बाहर निकलते हैं। कभी चार, कभी छह तो कभी बीस तक अजगरों को देखने का मौका मिलता है।

ठंड में निकलते हैं बाहर
पीपल पेड़ की खोखली शाखाओं से अजगर ठंड के दिनों में ज्यादा बाहर निकलते हैं। गर्मी में रात को बाहर आते हैं। ठंड में ही देखने के लिए भीड़ जुटती है। हर दिन लोगों का जमावड़ा लगा रहता है। ठंड के मौसम में जैसे ही धूप निकलनी शुरू होती है, वैसे ही अजगर भी धूप सेंकने पेड़ के खोखर से बाहर निकलते हैं। एक-एक कर जब अजगर निकलते हैं तो वह रोमांच भरा नजारा होता है।

‘धनबोड़ा’ मानते हैं ग्रामीण
भड़ेसर के ग्रामीण अजगरों को ‘धनबोड़ा’ मानते हैं। इसी के चलते जहां वे अजगरों की पूजा-अर्चना करते हैं। साथ ही कोई उसे मारता भी नहीं है। ग्रामीणों में आस्था है कि अजगरों के रहने से धन की प्राप्ति होती है और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। ग्रामीण हर विशेष अवसर पर अजगरों की आरती उतारने पहुंचते हैं।

गांव की शान बने अजगर
जिला मुख्यालय से लगे होने के बाद भी ग्राम भड़ेसर की पहचान लोगों के बीच नहीं थी, मगर जब से पीपल पेड़ पर अजगर होने की बात सामने आई है, तब से भडे़सर गांव की प्रसिद्धि दूर-दूर तक हो गई है। यही कारण है कि लोग, अजगरों को गांव की शान समझते हैं। जो भी लोग बाहर से देखने आते हैं, उन्हें उस जगह ग्रामीण पहुंचाने भी जाते हैं।

अजगर एक पालतू प्रजाति का जीव : प्रो केशरवानी
शासकीय एमएमआर पीजी कॉलेज चांपा के जंतु विज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. अश्विनी केशरवानी ने बताया कि अजगर, एक पालतू प्रजाति का जीव है। जो अनुकूल वातावरण मिलने से वर्षों तक एक ही स्थान पर रह सकता है। अजगर, विचरण करते समय भोजन की तलाश कर लेते हैं। छोटे जंतुओं को वे निगल जाते हैं अजगर में जहर नहीं मिलता। इससे वे ज्यादा हिंसक नहीं होते। ये अलग बात है कि लोग, अजगर को खाते न देखे हांे, मगर कुछ न कुछ खाते जरूर हैं। वैसे कुछ दिनों तक अजगर मिट्टी खाकर भी जीवित रह सकता है।

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

लघुकथा - चिंटी का सामर्थ्य

वैज्ञानिक युग में हम चांद पर पहुंचकर आसियां बसाने की जितनी बातें कर लें, लेकिन हमारासामर्थ्यकई जंतुओं के मुकाबले कम ही नजर आता है। हम जितना भी विकास कर लें, जितनी भी नई तकनीक के माध्यम से जीवन को सुलभ बना लें, लेकिन उन जैसी सामर्थ्य की शक्ति नहीं ला सकते। यही कारण है कि मनुष्य में पूरा सामर्थ्य तो दिखता है, किन्तु समाज उत्थान की दिशा में यह कोई काम नहीं आता। मनुष्य को 84 लाख योनियों में उच्च स्थान दिया गया है और सोचने-समझने की शक्ति भी दी गई है, लेकिन जो सामर्थ्य का परिचय, उसे देना चाहिए, वह मनुष्य नहीं दे पाता। ऐसी स्थिति में मनुष्य-मनुष्य में सामर्थ्यवान होने की लड़ाई चलती है औरखिसियाई बिल्ली की तरह खंभा नोचेकी तर्ज पर एक-दूसरे के सामर्थ्य को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं।
मनुष्य के सामर्थ्य से इतर एक दूसरा पहलू है, वह चिंटी का सामर्थ्य है। चिंटी में गजब का सामर्थ्य दिखता है। दुनिया में वैसे तो कई अन्य प्राणियों की तरह चिंटी छोटा होता है, परंतु सामर्थ्यवान होने की असली तस्वीर चिंटी में ही दिखाई देती है। जब वह अपने से अधिक वजन के एक-एक अन्न के दाने को ले जाता है और यह सिलसिला तब तक चलते रहता है, जब तक उस स्थान से अंतिम ‘ अन्न का दाना’ खत्म न हो जाए। साथ ही चिंटियों में सामर्थ्य की लड़ाई कहीं दिखाई नहीं देती, वे बस ‘कर्म किए जा, फल की इच्छा न करने पर’ विश्वास करते हैं। फलस्वरूप, जब सामर्थ्यवान होने की तुलना होती है तो चिंटी से मनुष्य, कहीं आगे होता है। केवल बलशाही व बुद्धिजीवी होने का दंभ भरकर, ‘सामर्थ्यवान’ नहीं बना जा सकता है, यही शाश्वत सत्य है।

बुधवार, 10 अगस्त 2011

‘तुर्रीधाम में पहाड़ का सीना चीर बहती है अनवरत जलधारा’

देश में ऐसे अनेक ज्योतिर्लिंग है, जहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। भक्तों में असीम श्रद्धा भी देखी जाती है। सावन के महीने में शिव मंदिरों की महिमा और ज्यादा बढ़ जाती है, क्योंकि इस माह जो भी मन्नतें सच्चे मन से मांगी जाती है, ऐसी मान्यता है, वह पूरी होती हैं। लोगों में भगवान के प्रति अगाध आस्था ही है, जहां हजारों-लाखों की भीड़ खींची चली आती है।
ऐसा ही एक स्थान है, तुर्रीधाम। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के सक्ती क्षेत्र अंतर्गत ग्राम तुर्री स्थित है। यहां भगवान शिव का एक ऐसा मंदिर है, जहां पहाड़ का सीना चीर अनवरत जलधारा बहती रहती है। खास बात यह है कि यह जलधारा कहां से बह रही है, अब तक पता नहीं चल सका है। आज भी यह शोध का विषय बना हुआ है कि आखिर पहाड़ी क्षेत्रों से पानी का ऐसा स्त्रोत कहां से है, जहां हर समय पानी की धार बहती रहती है।
दिलचस्प बात यह है कि बरसात में जलधारा का बहाव कम हो जाता है, वहीं गर्मी में जब हर कहीं सूखे की मार होती है, उस दौरान जलधारा में पानी का बहाव बढ़ जाता है। इसके अलावा जलधारा के पानी की खासियत यह भी है कि यह जल बरसों तक खराब नहीं होता। यहां के रहवासियों की मानें तो 100 साल बाद भी जल दूषित नहीं होता। यही कारण है कि तुर्रीधाम के इस जल को ‘गंगाजल’ के समान पवित्र माना जाता है और जल को लोग अपने घर ले जाने के लिए लालायित रहते हैं।
एक बात और महत्वपूर्ण है कि शिव मंदिरों में जब भक्त दर्शन करने जाते हैं तो वहां भगवान शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं, मगर यहां कुछ अलग ही है। जलधारा के पवित्र जल को घर ले जाने श्रद्धालुओं में जद्दोजहद मची रहती है तथा वे कोई न कोई ऐसी सामग्री लेकर पहुचंते हैं, जिसमें जल भरकर ले जाया जा सके। इन्हीं सब विशेषताओं के कारण तुर्रीधाम में दर्शन के लिए छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश, झारखंड, उड़ीसा तथा बिहार समेत अन्य राज्यों से भी दर्शनार्थी आते हैं और यहां के मनोरम दृश्य देखकर हतप्रद रह जाते हैं। यहां की अनवरत बहती ‘जलधारा’ सहसा ही किसी को आकर्षित कर लेती हैं। साथ ही लोगों के मन में समाए बगैर नहीं रहता और जो भी एक बार तुर्रीधाम पहुंचता है, वह यहां दोबारा आना चाहता है।
करवाल नाले के किनारे स्थित तुर्रीधाम में भगवान शिव का मंदिर है। यहां अन्य और मंदिर है, जो पहाड़ के उपरी हिस्से में स्थित है। अभी सावन महीने में भी हर सोमवार को ‘तुर्रीधाम’ में हजारों की संख्या में पहुंचे। इस दौरान यहां 15 दिनों का मेला लगता है, जहां मनोरंजन के साधन प्रमुख आकर्षण होता है। महाशिवरात्रि में भी भक्तों की भीड़ रहती है और सावन सोमवार की तरह उस समय भी दर्शन के लिए सुबह से देर रात तक भक्तों की कतार लगी रहती हैं।
किवदंति है कि ‘तुर्रीधाम’ में बरसों पहले एक युवक को सपने में भगवान शिव ने दर्शन दिए और कुछ मांगने को कहा। उस समय ग्राम - तुर्री में पानी की समस्या रहती थी और गर्मी में हर जगह पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची रहती थी। भगवान शिव को उस युवक ने ‘पानी-पानी’ कहा और एक जलधारा बहने लगी, जिसकी धार अब तक नहीं रूकी है। इसके बाद से यहां भगवान शिव का मंदिर बनवाया गया। इस तरह तुर्री ने एक धाम का रूप ले लिया और भक्तों की श्रद्धा भी बढ़ने लगी। लोगों की भक्ति इसलिए और बढ़ जाती है, क्योंकि तुर्री में पानी की समस्या अब कभी नहीं हुई। साथ ही गर्मी में जलधारा के पानी का बहाव तेज होना भी लोगों की जिज्ञासा का विषय बना हुआ है।
तुर्रीधाम मंदिर की व्यवस्था समिति के सदस्य कृष्णकुमार जायसवाल ने बताया कि तुर्रीधाम के भगवान शिव के दर्शन से संतान प्राप्ति होती है। इसी के चलते छग के अलावा दूसरे राज्यों बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश समेत अन्य जगहों से भी निःसंतान दंपती भगवान शिव के दर्शनार्थ पहुंचते हैं। तुर्रीधाम में जो जलधारा बहती है, वह प्रकुति उपहार होने के कारण इसे देखने वाले वैसे तो साल भर आते रहते हैं, मगर सावन महीने के हर सोमवार तथा महाशिवरात्रि पर भक्तों की भीड़ हजारों की संख्या में रहती है। अपनी खास विशेषताओं के कारण ही आज ‘तुर्रीधाम’ की छग ही नहीं, वरन देश के अन्य राज्यों में भी अपनी एक अलग पहचान है।

बुधवार, 27 जुलाई 2011

लक्षलिंग में चढ़ता है एक लाख चावल !

छत्तीसगढ़ की काशी के नाम से विख्यात लक्ष्मणेश्वर की नगरी खरौद में सावन सोमवार पर श्रद्धालुओं का तांता लगता है। भगवान लक्ष्मणेश्वर के दर्शन के लिए प्रदेश से अनेक जिलों के अलावा दूसरे राज्यों से भी दर्शनार्थी भगवान शिव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यहां सावन सोमवार के दिन सुबह से श्रद्धालुओं की लगी कतारें, देर रात तक लगी रहती हैं और भक्तों के हजारों की संख्या में उमड़ने के कारण मेला का स्वरूप निर्मित हो जाता है। भगवान लक्ष्मणेश्वर स्थित ‘लक्षलिंग’ में एक लाख चावल चढ़ाया जाता है और श्रद्धालुओं में असीम मान्यता होने से दर्शन करने वालों की संख्या में दिनों-दिन इजाफा होता जा रहा है। प्रत्येक सावन सोमवार में हजारों लोग भगवान लक्ष्मणेश्वर के दर्शन करते हैं और पुण्य लाभ के भागी बनते हैं।
8 वीं शताब्दी में बने लक्ष्मणेश्वर मंदिर की अपनी विरासत है और यह मंदिर अपनी स्थापत्य कला के लिए छग ही नहीं, वरन् देश भर में जाना जाता है। कई बार यहां विदेशों से भी इतिहासकारों का आना हुआ है। खासकर, खरौद में एक और मंदिर ‘ईंदलदेव’ है, जहां की ‘स्थापत्य कला’ देखते ही बनती है। इसी के चलते दूर-दूर से इस मंदिर को लोगों का हुजूम उमड़ता है, वहीं इतिहासकारों व पुराविदों के अध्ययन का केन्द्र, यह मंदिर बरसों से बना हुआ है। दूसरी ओर खरौद स्थित लक्ष्मणेश्वर मंदिर में सावन सोमवार के अलावा तेरस पर भी श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। साथ ही ‘महाशिवरात्रि’ पर हजारों लोग भगवान लक्ष्मणेश्वर के दर्शन के लिए उमड़ते हैं। उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखंड समेत अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में दर्शन के लिए लोग पहुंचते हैं।
अभी सावन महीने में हर सोमवार को हजारों श्रद्धालु लक्ष्मणेश्वर नगरी की ओर कूच करते हैं। सुबह से ही ‘बोल-बम’ के नारे के साथ मंदिर परिसर व पूरा नगर गूंजायमान हो जाता है, क्योंकि दूर-दूर से कांवरियों का जत्था पहुंचता है। श्रद्धालुओं की भीड़ के चलते उन्हें भगवान के दर्शन पाने घंटों लग जाते हैं और वे कतार में लगकर अपनी मनोकामना पूरी करने भगवान से प्रार्थना करते हैं। मंदिर परिसर के बाहर कुछ सामाजिक संगठनों के द्वारा भक्तों को नीबू पानी पिलाया जाता है और नाश्ता की भी व्यवस्था की जाती है।
भगवान शिव के दर्शन के लिए रविवार की शाम को ही दूर-दूर से आए श्रद्धालु पहुंच जाते हैं। साथ ही धार्मिक नगरी शिवरीनारायण में भी भक्त ठहरे रहते हैं। इसके बाद महानदी के त्रिवेणी संगम से कांवरिए जल भरकर खरौद पहुंचते हैं। इस दौरान पूरे मार्ग में बोल-बम का नारा गूंजता रहता है। मंदिर परिसर में भी गेरूवां रंग पहने कांवरिए पूरे उत्साह के साथ भगवान के दर्शन करते हैं। वे पैदल ही दूर-दूर से आते हैं और उनके पांव में छाले भी पड़ जाते हैं, मगर उनकी आस्था कहें कि भगवान लक्ष्मणेश्वर की असीम कृपा, किसी के पग नहीं रूकते और न ही, किसी तरह के दर्द का अहसास होता है।
इस बारे में मंदिर के पुजारी सुधीर मिश्रा ने बताया कि 8 वीं सदी में बना यह मंदिर आज भी लोगों के आकर्षण का केन्द्र है। साथ ही भक्तों में भगवान लक्ष्मणेश्वर के प्रति असीम मान्यता है, क्योंकि यहां सच्चे मन से जो भी मांगा जाता है, वह पूरी होती है। लिहाजा छग ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों से भी दर्शनार्थी आते हैं। सावन सोमवार के दिन सुबह से मंदिर में लंबी कतारें लग जाती हैं, इससे पहले रात्रि से ही कांवरियों का जत्था का धार्मिक नगरी में आगमन हो जाता है और वे भगवान के गान कर रतजगा भी करते हैं। उन्होंने बताया कि लक्ष्मणेश्वर में जो लक्षलिंग स्थित है, वैसा किसी भी शिव मंदिर में देखने को नहीं मिलता। यही कारण है कि लोग, भगवान के एक झलक पाने चले आते हैं। कई श्रद्धालु ऐसे भी होते हैं, जो हर अवसरों पर आते हैं और भगवान के आशीर्वाद के कृपापात्र बनते हैं। पुजारी श्री मिश्रा ने बताया सावन सोमवार के अलावा तेरस में भी इतनी ही भीड़ होती है। महाशिवरात्रि तो छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा पर्व यहीं होता है और मेला का माहौल होता है, क्योंकि हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि के दिन महिला व पुरूषों की अलग-अलग कतारें होती हैं, फिर भी दर्शन पाने में घंटों लग जाते हैं।


जमीं से 30 फीट उपर
भगवान लक्ष्मणेश्वर मंदिर में जो लक्षलिंग स्थित है, जिसमें एक लाख छिद्र होने की मान्यता है। वह जमीन से करीब 30 फीट उपर है और इसे स्वयंभू लिंग भी माना जाता है। लक्षलिंग पर चढ़ाया जल मंदिर के पीछे स्थित कुण्ड में चले जाने की भी मान्यता है, क्योंकि कुण्ड कभी सूखता नहीं।


क्षयरोग होता है दूर
ऐसी भी मान्यता है कि भगवान लक्ष्मणेश्वर के दर्शन मात्र से क्षयरोग दूर हो जाता है। बरसों से लोगों मे मन में यह आस्था कायम है और इसके कारण भी भक्त दूर-दूर से दर्शन के लिए आते हैं।

संतान प्राप्ति की भी मान्यता
भगवान लक्ष्मणेश्वर के दर्शन से निःसंतान दंपती को संतान प्राप्ति की भी मान्यता है। इसी के चलते दूर-दूर से ऐसी दंपती भगवान के द्वार पहुंचते हैं और मत्था टेकते हैं, जो संतान से महरूम हैं। उनमें ऐसी मान्यता है कि भगवान लक्ष्मणेश्वर के दर्शन से यह मुराद पूरा होता है।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

‘भगवान जगन्नाथ जी का मूल स्थान है शिवरीनारायण’

छत्तीसगढ़ के गुप्त प्रयाग के नाम से विख्यात धार्मिक नगरीशिवरीनारायणमें हर बरस निकलने वालीरथयात्राकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक है और दशकों से रथयात्रा की परिपाटी चलती रही है। शिवरीनारायण में निकलने वाली रथयात्रा की महिमा इसलिए और बढ़ जाती है, क्योंकि पुरी ( उड़ीसा ) में विराजे भगवान जगन्नाथ जी का मूल स्थानशिवरीनारायणको माना जाता है। यही कारण है कि रथयात्रा के दिन शिवरीनारायण में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है तथा क्षेत्र के सैकड़ों के लोग यहां दर्शनार्थ पहुंचते हैं।
दरअसल, शिवरीनारायण, रायपुर जिले से लगे होने तथा जांजगीर-चांपा जिले के अंतिम छोर में बसे होने के कारण आसपास गांवों के लोगों का हुजूम रथयात्रा देखने उमड़ता है। जिस तरह पुरी में मनाई जाने वाली रथयात्रा की प्रसिद्धि देश-दुनिया में है, उसी तरह शिवरीनारायण में मनने वाली रथयात्रा की अपनी पहचान छत्तीसगढ़ में कायम है। इससे इस बात से भी समझा जा सकता है कि दशकों से चली आ रही इस परंपरा के प्रति लोगों में असीम श्रद्धा है और वे पूरी तन्मयता के साथ भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भगवान के एक दर्शन पाने वे हर पल लालायित नजर आते हैं और जब रथयात्रा निकलती है, उस दौरान भगवान के दर्शन करने तथा प्रसाद पाने के लिए सैकड़ों की संख्या में भीड़ जुटती है।
इस बारे में शिवरीनारायण के मठाधीश राजेश्री महंत रामसुंदर दास जी का कहना है कि प्रदेश में तो शिवरीनारायण से निकलने वाली रथयात्रा की पहचान दशकों से कायम है। साथ ही कई अन्य राज्यों से भी साधु-संत पहुंचते हैं। रथयात्रा के इतर शिवरीनारायण में श्रद्धालु दर्शनार्थ पहुंचते रहते हैं, मगर रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन का फल श्रद्धालुओं को उतना ही मिलता है, जितना इस दिन पुरी के भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन से पुण्य मिलता है, क्योंकि शिवरीनारायण, भगवान जगन्नाथ जी का मूल स्थान है। उन्होंने बताया कि माघी पूर्णिमा के समय शिवरीनारायण में मेला लगता है, जो छग का सबसे बड़ा मेला है। इसमें उड़ीसा, झारखंड, मध्यप्रदेश समेत अन्य राज्यों के लोग आते हैं। माघी पूर्णिमा के दिन त्रिवेणी संगम में शाही स्नान साधु-संत करते हैं और लोगों की भी भीड़ उमड़ती है, क्योंकि भगवान जगन्नाथ, एक दिन के लिए शिवरीनारायण मंदिर में विराजते हैं।
उल्लेखनीय है कि शिवरीनारायण की अपनी एक सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत है और इसीलिए छग सरकार ने इसे ‘धार्मिक नगरी’ घोषिेत किया है। साथ ही छग में शिवरीनारायण को गुप्त प्रयाग के रूप में जाना जाता है और यह भी किवदंति है कि भगवान राम, इसी रास्ते से होकर गए थे, जिसके प्रमाण यहां के जानकार आज भी बताते हैं। जैसा रामायण में भगवान राम का ‘वरगमन’ का उल्लेख है, कुछ उसी तरह से शिवरीनारायण के साथ धार्मिक मान्यता भी जुड़ी हुई हैं। यह भी कहा जाता है कि भगवान राम को वनगमन के समय यहीं माता शबरी ने बेर खिलाए थे, इसके कारण इस नगरी का नाम ‘शबरीनारायण’ पड़ा। हालांकि, बाद में इसे शिवरीनारायण के तौर पर पुकारा जाने लगा।
शिवरीनाराण में ऐसी कई स्थितियां हैं, जिससे पता चलता है कि भगवान राम ने नाव पर सवार होकर नदी पार की थी। कालांतर में यही नदी, महानदी अर्थात चित्रोत्पला नदी कहलायी। नदी के उस पार एक बरगद का पेड़ है, जहां नाव जाकर रूकी थी, ऐसा भी जानकार बताते हैं। इस तरह ऐसे कई प्रमाण जानकार बताते हैं, जिसके कारण इस धार्मिक नगरी के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ती जा रही है।
शिवरीनारायण में तीन नदियों का त्रिवेणी संगम है, जहां महानदी ( चित्रोत्पला ), जोंक व शिवनाथ नदी एक जगह पर आकर मिली हैं। इसके कारण भी शिवरीनारायण की महत्ता उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद के सामान है, क्योंकि वहां तर्पण के बाद पुण्य आत्मा जितनी शांति मिलती है, कुछ ऐसी ही मान्यता त्रिवेणी संगम में ‘तर्पण’ का है। इसी के चलते छग ही नहीं, वरन अन्य प्रदेशों से भी लोगों का तर्पण के लिए आना होता है।
बहरहाल, शिवरीनारायण की धार्मिक मान्यता बढ़ती जा रही है। साथ ही प्रसिद्धि भी, क्योंकि पर्यटन सिटी बनने के बाद यह देश के नक्शे पर आ गया है। भविष्य में सरकार इस नगरी के विकास पर ध्यान दे तो निश्चित ही आने वाले दिनों में दर्शनार्थियों का रेला उमड़ेगा।


छग की काशी ‘खरौद’ की भी महत्ता
खरौद को छत्तीसगढ़ की काशी के नाम भी जाना जाता है। यहां भगवान लक्ष्मणेश्वर भगवान विराजे हैं। भगवान लक्ष्मणेश्वर की महत्ता इसलिए है कि यहां लक्षलिंग है, जिसमें एक लाख छिद्र हैं और यहां सच्चे मन से जो भी मन्नतें मांगी जाती हैं, वह पूरी होती हैं। खरौद में महाशिवरात्रि पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है, क्योंकि इस दिन हजारों की संख्या में लोग, दर्शन के लिए पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि के दिन भगवान लक्ष्मणेश्वर के दर्शन करने से शुभ फल प्राप्त होता है। इसके अलावा सावन माह तथा तेरस के समय भी भगवान के दर्शन के लिए भक्तों की कतार लगी रहती है।

शुक्रवार, 24 जून 2011

‘राष्ट्रपति को भा गई छत्तीसगढ़ की आत्मीयता’

छत्तीसगढ़ नेधान का कटोराके तौर पर देश-दुनिया में पहचान रखी है। प्रदेश की प्राचीन संस्कृति लोककला यहां की प्रमुख विरासत है। छग में दूसरे राज्यों तथा अन्य देशों से जब भी कोई पहुंचते हैं तो वे सहसा ही यहां के लोगों की आत्मीयता से अभिभूत हो जाते हैं। वनांचल क्षेत्रों की आदिवासी संस्कृति परंपरा जानकर हर कोई वाह-वाह किए बगैर नहीं रहता और यहां की यादों को अपनी संस्मरण में उतार लेते हैं। छत्तीसगढ़ के लिए अक्सर कहा जाता है - ‘छत्तीसगढ़िया-सबसे बढ़िया यह उक्ति आज की बनाई हुई नहीं है, बल्कि बरसों से ऐसा ही छत्तीसगढ़ियों के लिए प्रचलित है। प्रदेश के रहवासियों को इसलिए ऐसा कहा जाता है, क्योंकि वे सहज, सरल होने के साथ-साथ आत्मीयता के गुणों से लबरेज माने जाते हैं। इस बात को जब भी अवसर मिलता है, तब-तब छत्तीसगढ़ियों ने साबित भी किया है। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा तो मिला हुआ है ही, साथ ही यह राज्य मेंगुरतुर गोठके तौर पर भी जानी जाती है। छत्तीसगढ़ी में इतनी मिठास है कि दूसरे राज्यों से आकर यहां रहने वाले लोग भी धीरे-धीरे इस भाषा को बोलचाल में शामिल कर लेते हैं।

इधर दो दिनी छत्तीसगढ़ के दौरे पर राजधानी रायपुर पहुंची, राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भी प्रदेश की अवाम की आत्मीयता से गदगद नजर आईं। वैसे राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल, दूसरी बार छत्तीसगढ़ के प्रवास पर आई हैं। लिहाजा, संबोधन के दौरान उनका छग तथा यहां के रहवासियों से सीधा जुड़ाव देखा गया। राजधानी की विधानसभा में बने सेंट्रल-हॉल का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि छग में वे दूसरी बार आई हैं और जिस तरह यहां की जनता में आत्मीयता है, वह काबिले तारीफ हैं। साथ ही उन्होंने छग के विकास के मामले में बढ़ते सोपान के लिए प्रदेश की जनता को बधाई दी। उन्होंने नक्सलियों को हिंसा व बंदूक की लड़ाई छोड़, मुख्यधारा में लौटने का आह्वान करते हुए, अपराध व हिंसा को समाज, राज्य तथा देश के लिए खतरनाक बताया। महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल ने कहा कि छग में लिंगानुपात, अन्य दूसरे राज्यों की अपेक्षा बेहतर है, उन्होंने बढ़ते भ्रूणहत्या को घोर अपराध करार दिया। उन्होंने कहा कि महिलाओं के उत्थान की दिशा में हर स्तर पर प्रयास होना चाहिए, इसके बगैर सामाजिक विकास संभव नहीं है। जब महिलाएं आगे बढ़ेंगी तो निश्चित ही प्रदेश व देश प्रगति करेगा और समाज विकसित होगा।
इस अवसर पर महामहिम राज्यपाल श्री शेखर दत्त, मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, विधानसभा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक, नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे समेत विधानसभा के सदस्यगण व अफसर उपस्थित थे।



न कांग्रेस की जीत, न भाजपा की
अपने प्रवास के दूसरे दिन अर्थात् 25 जून को महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल, रायपुर नगर निगम की नई बिल्डिंग को लोकार्पित करेंगी। इस तरह बिल्डिंग के लोकार्पण के बाद यह विवाद भी थम जाएगा कि आखिर भवन को किसके हाथों लोकार्पित कराया जाए ? दरअसल, नगर निगम में कांग्रेस की महापौर श्रीमती किरणमयी नायक हैं और प्रदेश में भाजपा की सरकार तथा सभापति भाजपा के हैं, ऐसे में पिछले कुछ महीनों से यह विवाद छाया रहा। कांग्रेस के लोग चाहते थे कि इस भवन का लोकार्पण, यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी या फिर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह करें, दूसरी तरफ भाजपा के लोग यह चाहते थे कि भवन का लोकार्पण राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी या फिर लालकृष्ण आडवाणी करें। हालांकि, इस विवाद का अंत बेहतर तरीके से हो रहा है, क्योंकि न तो कांग्रेस की जिद पूरी हुई और न ही, भाजपा की। यह कहना सही होगा कि निगम की नई बिल्डिंग का लोकार्पण महामहिम राष्ट्रपति के हाथों होना भी एक सुनहरा पल होगा, क्योंकि इतनी बड़ी उम्मीद किसी को न थीं। आखिर कहा भी जाता है- जो होता है, अच्छे के लिए होता है।

मंगलवार, 14 जून 2011

यहां होता है तालाब का विवाह !

- 80 बरस बाद दोहराई गई परंपरा
- केरा गांव के लोगों का अनूठा कार्य
- तालाबों के अस्तित्व को बचाने की मुहिम
- जल संरक्षण की दिशा में ग्रामीणों का अहम योगदान
- ‘जल ही जीवन है’, ‘जल है तो कल है’ का संदेश

भारतीय संस्कृति में संस्कार का अपना एक अलग ही स्थान है। सोलह संस्कारों में से एक होता है, विवाह संस्कार। देश-दुनिया में चाहे कोई भी वर्ग या समाज हो, हर किसी के अपने विवाह के तरीके होते हैं। मानव जीवन में वंश वृद्धि के लिए भी विवाह का महत्व सदियों से कायम है। इसके लिए समाज में एक दस्तूर भी तय किया गया है। ऐसे में आपको यह बताया जाए कि तालाब का भी विवाह होता है तो निश्चित ही आप चौंकेंगे ! मगर ऐसी विवाह की परंपरा को दोहराई गई है, छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के केरा गांव में, जहां 80 बरसों बाद एक बार फिर तालाब का विवाह कराया गया। सभी रीति-रिवाजों के साथ ग्रामीणों ने दो दिनों तक यहां राजापारा नाम के तालाब के विवाह संस्कार को पूर्ण कराया और इस तरह तालाबों के संरक्षण के साथ, उसके अस्तित्व को बचाने की गांव वालों की मुहिम जरूर रंग लाएगी।

दरअसल, महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत करीब 5 लाख रूपये खर्च कर केरा गांव के ‘राजापारा तालाब’ का गहरीकरण कराया गया और जल संरक्षण की दिशा में ग्रामीणों ने अहम योगदान देते हुए, एक पुरानी परंपरा के माध्यम से घटते जल स्तर को बचाने के लिए अपनी पूरी सहभागिता निभाई। इस अनूठे विवाह के बारे में जानकर कोई भी एकबारगी विश्वास नहीं कर रहा है और यही कारण है कि केरा में संपन्न हुई इस अनूठी परंपरा, समाज के लिए एक मिसाल भी साबित हो रही हैं। ‘जल ही जीवन है’, ‘जल है तो कल है’, इन सूत्र वाक्यों को जीवन में उतारते हुए हमें ‘जल’ को बचाने के लिए हर स्तर पर कोशिश करनी चाहिए। इस लिहाज से निश्चित ही केरा गांव के ग्रामीणों ने अनुकरणीय कार्य किया है।

ग्राम पंचायत केरा ( नवागढ़) के सरपंच लोकेश शुक्ला ने बताया कि आठ दशक पहले गांव के ‘बर तालाब’ में इस तरह विवाह का आयोजन किया गया था। इसके बाद यह परंपरा अभी निभाई गई है। उनका कहना है कि जब भी गांव में शुभ कार्य होता है तो ग्रामीणों द्वारा तालाब विवाह की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। यह तय नहीं है कि कब विवाह संस्कार का आयोजन होगा और इसके लिए एक ही तालाब तय नहीं रहता। पूर्वजों द्वारा ऐसी परिपाटी की शुरूआत की गई थी, उस परंपरा को अरसे बाद निभाने का मौका नई पीढ़ी को अब मिला है।

सरंपच श्री शुक्ला ने बताया कि जब उन्हें तालाब के विवाह कराने संबंधी जानकारी मिली तो वे अभिभूत हो गए और इसके लिए ग्रामीणों को हर संभव सहयोग का भरोसा दिलाया। 11 जून को कलश यात्रा के साथ विवाह संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान कलश यात्रा में बड़ी संख्या में कन्याएं, युवती व महिलाएं समेत ग्रामीण शामिल हुए। कलश कलश गांव की गलियों से घूमती हुई चंडी मां मंदिर होते हुए राजापारा तालाब पहुंची। यहां दो दिनों तक विवाह कार्यक्रम पूरे रीति-रिवाजों के साथ संपन्न कराया गया।

उन्होंने बताया कि गांव में तालाब विवाह की पुरानी परिपाटी तो है ही, साथ ही आज के दौर में घटते जल स्तर के लिहाज से भी यह इसलिए काफी महत्वपूर्ण भी है कि इस बार ‘राजापारा तालाब’ का मनरेगा के तहत गहरीकरण कराया गया है। इससे जल संवर्धन की दिशा में भी बेहतर कार्य हो रहा है। दूसरी ओर ग्रामीणों में यह भी मान्यता है कि तालाब के विवाह से गांव में जलजनित बीमारी नहीं फैलती और किसी तरह दैवीय प्रकोप का संकट नहीं होता। लोगों में इसलिए भी ‘तालाब विवाह’ के प्रति लगाव है कि 100 कन्याओं के विवाह की अपेक्षा तालाब विवाह में सहभागिता से उतने पुण्य की प्राप्ति होती है। इन्हीं सब कारण से लोगों का रूझान बढ़ा और 80 बरस बाद एक बार फिर गांव में तालाब विवाह की परंपरा दुहराई जा सकी।

वर बने ‘वरूणदेव’, वधु बनी ‘वरूणीदेवी’
केरा गांव में संपन्न हुए तालाब विवाह में वर के रूप में भगवान वरूणदेव को विराजित किया गया, वहीं वधु के रूप में वरूणीदेवी को पूजा गया। ग्रामीणों ने पूरे उत्साह से इनका विवाह रचाया और दो दिन तक चले विवाह कार्यक्रम में हर वह रस्म पूरी की गई, जो किसी व्यक्ति की शादी में निभाई जाती है। तालाब विवाह में लोगों का उत्साह देखते बना और उनका हुजूम उमड़ पड़ा। जिन्होंने इस अनूठे विवाह के बारे में जाना, वह सहसा ही खींचे चला आया।


विवाह
की साक्षी बनीं सांसद
केरा की ‘तालाब विवाह’ परंपरा की साक्षी जांजगीर-चांपा की सांसद श्रीमती कमला पाटले भी बनीं। वे यहां ग्रामीणों के उत्साह बढ़ाने विशेष तौर पर उपस्थित रहीं। इस दौरान उन्होंने कहा कि ग्रामीणों का प्रयास काबिले तारीफ है, क्योंकि एक तरफ दिनों-दिन जल स्तर घट रहा है तथा पुराने तालाबों का अस्तित्व मिट रहा है। ऐसे में तालाब संरक्षण कार्य के दृष्टिकोण से लुप्त होती परंपरा भी समाज को संदेश देती है। इस शुभ आयोजन में पहुंचना ही अपने आप में बड़ी बात है, क्योंकि जल के बिना कोई भी जीव-जंतु जीवित नहीं रह सकता।

शनिवार, 26 मार्च 2011

शिव की बारात में उमड़े ‘नागा साधु’

पीथमपुर में रंग पंचमी से शुरू होने वाले मेले में भीड़ उमड़ रही है। मेले के पहले दिन भगवान शिव की बारात निकली, जिसमें देश के अनेक अखाड़ों से आए नागा साधु बड़ी संख्या में शामिल हुए और शौर्य प्रदर्शन किए। बाबा कलेश्वर नाथ धाम में दर्शन के लिए भक्त दूर-दूर से पहुंचते हैं। मेले की रौनकता में पहले से जरूर कमी आई है, मगर भगवान कलेश्वरनाथ के प्रति असीम श्रद्धा का ही परिणाम है कि अब भी मेले के माध्यम से एक प्राचीन संस्कृति की पहचान कायम है।

जिला मुख्यालय जांजगीर से 15 किमी दूर ग्राम पीथमपुर में बरसों से मेला लगता आ रहा है। बाबा कलेश्वरनाथ मंदिर में पूजा-पाठ के बाद चांदी की पालकी में भगवान शिव की बारात निकलती है और इस तरह मेला शुरू होता है। रंग-पंचमी के ही दिन पीथमपुर में मेला लगता है और यह सात दिन चलता है। पहले मेला तीन दिन का हुआ करता था। बदलते समय के साथ मेले के स्वरूप में काफी परिवर्तन आया है। मेले का खास आकर्षण देश के अनेक प्रदेशों के अखाड़ों से आए नागा साधु होते हैं। जिनके आशीर्वाद के लिए भी दूर-दूर से भक्त पहुंचते हैं।

पीथमपुर में लगने वाला मेला अंचल का अंतिम मेला होने के कारण लोगों का उत्साह देखने लायक रहता है और आसपास गांवों के अलावा दूसरे जिलों से भी लोगों का हुजूम उमड़ता है। मेले में मनोरंजन के साधन की भी व्यवस्था होती है, इसके चलते शाम को अधिक संख्या में लोगों का जमावड़ा होता है। इस वर्ष पीथमपुर मेले में इलाहाबाद, द्वारिकानाथ, बद्रीनाथ, गुजरात समेत अन्य स्थानों से पहुंचे हैं।


मंदिर के इतिहास पर एक नजर

बाबा कलेश्वरनाथ मंदिर परिसर की दीवार में लगे शिलालेख के मुताबिक मंदिर का निर्माण कार्तिक सुदी 2, संवत 1755 को किया गया था। बाद में मंदिर के जीर्ण-शीर्ण होने के कारण चांपा के जमींदारों ने निर्माण कराया। भगवान शिवजी की बारात की परिपाटी 1930 से शुरू होने की जानकारी मिलती है। इसके बाद से लगातर रंग पंचमी के दिन बारात की परंपरा कायम है और दूर-दूर से आकर नागा साधु शामिल होते हैं। पीथमपुर के कलेश्वरनाथ मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग है, इसे सपने में देखने के बाद एक परिवार के व्यक्ति ने खोदाई करवाकर निकलवाया था और फिर मंदिर का निर्माण कर प्रतिमा की स्थापना की गई। इस तरह पीथमपुर में शिव की बारात के साथ मेले का सिलसिला अब तक चल रहा है।

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

एक मिसाल परोपकार की

भारत के लोगों में परोपकार की धारणा बरसों से कायम है। भले ही परोपकार के तरीकों में समय-समय पद बदलाव जरूर आए हों, लेकिन अंततः यही कहा जा सकता है कि लोगों के दिलों में अब भी परोपकार की भावना समाई हुई है। इस बात को एक बार फिर सिद्ध कर दिखाया है, बेंगलूर के आईटी क्षेत्र के दिग्गज अजीम प्रेमजी ने। उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के अपनी जानी-मानी कंपनी विप्रो की दौलत में से करीब 88 सौ करोड़ रूपये एक टस्ट को दिया है, जो काबिले तारीफ है। ऐसा कम देखने को मिलता है, जब कोई बड़ा उद्योगपति अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा परोपकार के लिए दें और लोगों के दुख-दर्द में सहभागी बनें। समाजसेवी अजीम प्रेमजी का परोपकार की सोच, आज के समाज के लिए बड़ी मिसाल है, जिससे अन्य उद्योगपतियों के बीच एक ऐसा संदेश गया है कि वे भी कुछ इसी तरह कार्य कर समाज के प्रति अपना दायित्व प्रदर्शित करें।
अधिकतर यह देखा जाता है कि पैसा आने के बाद उसके प्रति व्यक्ति का मोह कायम हो जाता है, साथ ही वह अपनी सौ-दो सौ पीढ़ी के बारे में सोचने लगता है। ऐसे में यह भी समझने की जरूरत रहनी चाहिए कि हम अपनी पीढ़ी को निकम्मे बनाने की कोशिश करते हैं। यहां एक बात बताना जरूरी है कि अमेरिका के माइक्रोसाफ्ट कंपनी के मालिक बिल गेट्स एक अरसे से दुनिया के उद्योगपतियों के बीच यह अभियान चला रहे हैं कि उद्योगपति अपनी दौलत परोपकार में भी लगाएं, जिससे समाजसेवा के प्रति उनकी समर्पण की भावना सीधा लोगों से जुड़ सकें। कुल-मिलाकर यही कहा जा सकता है कि कुछ लोग समाजसेवा के नाम अस्पतालों तथा आश्रमों में फल व कपड़ा बांटकर वाह-वाही लुटने की कोशिश करते हैं, उनके लिए यह सबक है। ऐसा नहीं है कि परोपकार के लिए अधिक राशि चाहिए, कम राशि होने के बाद भी लोगों के बीच समाजसेवा किया जा सकता है, लेकिन उसमें किसी तरह का दिखावा नहीं होना चाहिए। यहां एक बार फिर समाजसेवी श्री प्रेमजी का जिक्र करना होगा, क्योंकि उन्होंने 88 सौ करोड़ रूपये देकर केवल परोपकार की भावना को सच्चे मन से व्यक्त किया है।
मैं समाजसेवी श्री प्रेमजी से परिचित नहीं हूं, लेकिन मीडिया में उनके बारे में जानकारी मिलने के बाद, अपने आपको इस परोपकार की मिसाल पर लिखने से नहीं रोक सका। निश्चित ही ऐसा व्यक्तित्व भारतीय समाज और देश के लिए गौरव की बात है, क्योंकि जिस देश में आज की स्थिति में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हो गई हों और धनपुरूशों में पैसा बटोरने का ऐसा बुखार चढ़ गया है, जिससे गरीब जनता पीस रही है। देश के धन को विदेशी बैंकों में जमाकर, उसे काला धन बनाने का जो कुत्सित प्रयास बरसों से जारी है, ऐसे लोगों को श्री प्रेमजी की परोपकारी भावना से रूबरू होना चाहिए, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई लोगों की भलाई के लिए न्यौछावर कर दिया।

बुधवार, 10 नवंबर 2010

ईट से बना खरौद का ईंदलदेव

जिला मुख्यालय जांजगीर से 55 किमी की दूरी पर छत्तीसगढ़ की काशी के नाम से विख्यात लक्ष्मणेश्वर की नगरी खरौद स्थित है। इस धार्मिक नगरी में भगवान लक्ष्णेश्वर का मंदिर है। यहां के लक्षलिंग में एक लाख छिद्र हैं और यहां महाशिवरात्रि समेत तेरस और सावन मास मंे मेला लगता है तथा श्रद्धालुओं की संख्या भी हजारों की संख्या में जुटती है। खरौद में शबरी माता का भी मंदिर है, इसकी प्राचीन पहचान है। मंदिर के द्वार पर अद्धनारीश्वर की प्रतिमा है, जिस देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। पर्यटक, खरौद में पुरातात्विक धरोहर की एक झलक देखने की तमन्ना हर किसी में होती है। भगवान लक्ष्मणेश्वर की ख्याति प्रदेश के अलावा दूसरे स्थानों में भी है। खरौद के मांझापारा में स्थित ईंदलदेव का मंदिर बरसों से लोगों का आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। पुरातत्व के जानकार इस मंदिर को 6 वीं शताब्दी का बताते हैं। इस मंदिर को जांजगीर-चांपा जिले का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है। ईंदलदेव मंदिर में स्थापत्यकला की अमिट छाप देखने को मिलती है। मंदिर की विशेषता यह है कि मंदिर का द्वार पिछले हिस्से में है और मुख्य द्वार के दोनों ओर मां गंगा की प्रतिमा बनी हुई है, वह भी ईट से। खास बात यह भी है कि मंदिर में प्र्रतिमा विराजित नहीं है। करीब 40 फीट उंचे ईंदलदेव मंदिर के चारों ओर ईट से आकर्षक कलाकृतियां बनाई गई हैं, कहीं गुंबद का निर्माण किया गया है तो कहीं, देवी-देवताओं के चित्रों को भी आकर्षक ढंग से उकेरा गया है। मंदिर की महत्ता और प्राचीनता को देखते हुए न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि दूसरे प्रदेशों से भी पुराविद और इतिहासकार शोध के लिए आते हैं। विदेशों से भी पर्यटक मंदिर की बनावट देखने आ चुके हैं और ईट से बने ईंदलदेव मंदिर की खासियत को देखकर वे भी हतप्रभ रहे हैं। मंदिर के संरक्षण की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग के पास है और इस मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए कुछ प्रयास हुए हैं, लेकिन जिस तरह से प्राकृतिक आपदा के कारण ईट से बनी कलाकृति मिट रही है, जिसे बचाए और संरक्षित किए जाने की जरूरत है। अंधड़ और बारिष के प्रभाव में बरसों से मंदिर के रहने के कारण चारों ओर बनी स्थापत्यकला की बेजोड़ कलाकृति और चित्र प्रभावित हो रहे हैं। मंदिर की विरासत को कायम रखने प्राकृतिक आपदा के प्रभाव से निपटने पुराविद विभाग को ठोस पहल करना चाहिए। एक दशक पहले ईंटलदेव मंदिर की हालत काफी बिगड़ गई थी। बाद में पुरातत्व विभाग ने सुध लेते हुए मंदिर का कायाकल्प किया, लेकिन फिर भी मंदिर की दीवारों में बनी बेजोड़ कलाकृति को बचाने की कवायद आगामी दिनों में भी जरूरी है। पुरातत्व के जानकार डा. नन्हें प्रसाद द्विवेदी का कहना है कि ईंदलदेव मंदिर की प्राचीनता के कारण इसके बारे में लगातार शोध कार्य हो रहे हैं और ईट से बने होने के कारण यह स्थापत्यकला की दृष्टि से जिले ही नहीं, वरन प्रदेश की बेजोड़ कृति है, जिसकी बनावट देखते ही बनती है।

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ का गुप्त प्रयाग, शिवरीनारायण

छत्तीसगढ़ के गुप्त प्रयाग के नाम से दर्षनीय स्थल षिवरीनारायण को जाना जाता है और इस धार्मिक नगरी को छग षासन द्वारा टेंपल सिटी घोशित किया गया है। वैसे तो इस आस्था के केन्द्र की पहचान प्राचीन काल से है, लेकिन धार्मिक नगरी घोशित होने के बाद इसकी प्रसिद्धि और ज्यादा बढ़ गई।छत्तीसगढ़ के कई धार्मिक नगरी और पुरातन स्थलों में दषकों से मेला लगता आ रहा है। मेले में खेल-तमाषे के अलावा सिनेमा पहुंचता है, जो लोगों के प्रमुख मनोरंजन के साधन होते हैं। साथ ही मेले में समाप्त होते-होते षादी विवाह का दौर षुरू हो जाता है। वैसे तो मेले के आयोजन की विरासत दषकों से छत्तीसगढ़ में षामिल हैं, जो परिपाटी अब भी जारी है। जांजगीर-चांपा जिले में बसंत पंचमी के दिन से कुटीघाट में पांच दिवसीय मेला षुरू होता है। इसके बाद छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा माने जाने वाल षिवरीनारायण मेला, माघी पूर्णिमा से प्रारंभ होता है, जो महाषिवरात्रि तक चलता है। इस बीच जिले के अनेक स्थानों में मेला लगता है और अंत धूल पंचमी के समय पीथमपुर के महाकलेष्वर धाम में लगने वाले मेले के साथ समाप्त होता है। इस मेले में भगवान षिव की बारात में बड़ी संख्या में नागा साधु षामिल होते हैं। इन स्थानों में लगने वाले मेलों में दूसरे राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं और यहां की विरासत तथा इतिहास से रूबरू होते हैं। दूसरी ओर महाषिवरात्रि पर्व के दिन प्रदेष का सबसे बड़े एकदिवसीय मेले का अयोजन छग की काषी खरौद लक्ष्मणेष्वर धाम में होता है, जहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और लोगों की आस्था देखते ही बनती है। भक्त कई घंटों तक कतार में लगकर भगवान षिव के एक दर्षन पाने लालायित रहते हैं। इधर हर वर्श माघी पूर्णिमा से षिवरीनारायण में लगने वाले मेले में उड़ीसा, मध्यप्रदेष, उत्तरप्रदेष, महाराश्ट्र, झारखंड तथा बिहार समेत कई राज्यों के दर्षनार्थी आते हैं और माघी पूर्णिमा पर महानदी के त्रिवेणी संगम में होने वाले षाही स्नान में सैकड़ों की संख्या में जहां साधु-संत षामिल होते हैं, वहीं हजारों की संख्या में दूरस्थ क्षेत्रों से आए श्रद्धालु भी इस पावन जल पर डूबकी लगाते हैं। माघी पूर्णिमा के स्नान को लेकर मान्यता है कि माघ मास में दान कर त्रिवेणी संगम में स्नान करने से अष्वमेध यज्ञ करने जैसा पुण्य मिलता है और कहा जाता है कि इस माह की हर तिथि किसी पर्व से कम नहीं होता। इस दौरान किए जाने वाले दान का फल दस हजार गुना ज्यादा मिलता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। षिवरीनारायण को पुरी में विराजे भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान माना जाता है और मान्यता है कि भगवान जी माघी पूर्णिमा के दिन यहां विराजते हैं। यही कारण है कि श्रद्धालुओं की आस्था यहां उमड़ती हैं और वे चित्रोत्पला महानदी, षिवनाथ और जोंक नदी के त्रिवेणी संगम में स्नान कर भगवान जगन्नाथ के दर्षन करने पहुंचते हैं। षिवरीनारायण में कई दषकों से मेला लगता आ रहा है। 15 दिनों तक चलने वाले इस मेले की अपनी एक अलग ही पहचान है। अविभाजित मध्यप्रदेष के समय से षिवरीनारायण का यह मेला आकर्शण का केन्द्र रहा है, अब भी इसकी चमक फीकी नहीं पड़ी है। यही कारण है कि मेले को देखने और भगवान के दर्षन के लिए दूसरे राज्यों के दर्षनार्थी भी पहुंचते हैं। साथ ही विदेषों से भी लोग आकर भगवान की महिमा का गान करते हैं और इस विषाल मेले को देखकर मंत्रगुग्ध हो जाते हैं। षिवरीनारायण में भगवान षिवरीनारायण मंदिर के अलावा षिवरीनारायण मठ, केषवनारायण मंदिर, सिंदूरगिरी पर्वत, लक्ष्मीनारायण मंदिर, षक्तिपीठ मां अन्नपूर्णा, मां काली मंदिर षामिल हैं। यहां का भगवान षिवरीनारायण मंदिर का निर्माण कल्चुरी काल में हुआ था। ऐसा माना जाता है िकइस मंदिर की उंचाई, प्रदेष के सभी मंदिरों की उंचाई से अधिक है। मंदिर की दीवारें में उत्कृश्ट स्थापत्य कला की छठा दिखाई देती है, जो यहां पहुंचने वाले दर्षनार्थियों को अपनी ओर आकर्शित कर ही लेती है। यहां के प्राचीन षबरी मंदिर, जो ईट से बना है, इसमें की गई कलाकृति अब भी पुराविदों और इतिहासकारों के अध्ययन का केन्द्र बना हुआ है। सिंदूरगिरी पर्वत के बारे में कहा जाता है कि यहां अनेक साधु-संतों ने तप किया है और उनकी यह स्थान तप स्थली रही है। इस पर्वत से त्रिवेणी संगम का मनोरम दृष्य देखते ही बनता है। किवदंति है कि प्राचीन काल में जगन्नाथ पुरी जाने का यह मार्ग था और भगवान राम इसी रास्ते से गुजरे थे तथा माता षबरी से जूठे बेर खाए थे। इस बात का कुछ प्रमाण जानकार बताते भी हैं। इसी के चलते षिवरीनारायण में लगने वाले मेले में उड़ीसा से आने वाला उखरा और आगरा से आने वाले पेठे की खूब मांग रहती है तथा इसकी मिठास को लेकर भी लोगों में इसे खरीदने को लेकर उत्सुकता भी देखी जाती है। षिवरीनारायण पुराने समय में तहसील मुख्यालय था और इसकी भी अपनी विरासत है। साथ ही भारतेन्दुयुगीन साहित्य की छाप भी यहां पड़ी है और यह नगरी उस दौरान साहित्यिक तीर्थ बन गई थी। मेले के पहले दिन से ही रामनामी पंथ के लोगों का भी पांच दिवसीय राम नाम का भजन प्रारंभ होता है। पुरे षरीर में राम नाम का गोदमा गुदवाए रामनामी पंथ के लोग भगवान राम के अराध्य में पूरे समय लगे रहते हैं। इससे नगर में राम नाम का माहौल देखने लायक रहता है। षिवरीनारायण मेले के बारे में मठ मंदिर के मठाधीष राजेश्री महंत रामसुंदर दास का कहना है कि षिवरीनारायण में मेला का चलन प्राचीन समय से ही चला आ रहा है और यह छग का सबसे पुराना और बड़ा मेला है। इस मेले में दूसरे राज्यों के अलावा सैकड़ों गांवों के लाखों लोगों की भीड़ जुटती है। लोगों के मनोरंजन के लिए सर्कस, सिनेमा, मौत कुआं समेत अन्य साधन आकर्शण का केन्द्र रहते हैं। मेले की यह भी खासियत है कि यहां हर वह सामग्री मिल जाती है, जो दुकानों में नहीं मिलती। यही कारण है कि षिवरीनारायण मेले में लोगों द्वारा जमकर खरीददारी की जाती है। इसके अलावा षादी-विवाह की सामग्री भी लोग खरीदते हैं। उनका कहना है कि माघी पूर्णिमा से लगने वाले इस मेले के पहले दिन महानदी के त्रिवेणी संगम की निर्मल धारा पर लोग डूबकी लगाते हैं और खुद को धन्य महसूस करते हैं। इस दिन लाखों की संख्या में लोगों का आगमन षिवरीनारायण में होता है। पुरी से भी लोग आते हैं, क्योंकि भगवान जगन्नाथ एक दिन के लिए यहां विराजते हैं और वहां भोग नहीं लगता। साथ ही वहां के मंदिर के पट को भी बंद रखा जाता है। कुल-मिलाकर षिवरीनारायण के जगन्नाथ धाम में श्रद्धालु भगवान की भक्ति में रमे रहते हैं। माघी पूर्णिमा की सुबह भगवान षिवरीनारायण के दर्षन के लिए सैकड़ों किमी से श्रद्धालु जमीन पर लोट मारते मंदिर के पट तक पहुंचते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से जो भी मनोकामना होती है, वह पूरी होती है। माघी पूर्णिमा पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं को कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा भोजन और नाष्ता प्रदान किया जाता है। षिवरीनारायण के नगर विकास समिति द्वारा पिछले कई बरसों से दूर-दूर से आने वाले भक्तों को भोजन कराने की व्यवस्था की जाती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि समिति द्वारा लगातार दो दिनों तक बिना रूके, भोजन प्रदान किया जाता है। एक पंगत के उठते ही दूसरी पंगत बिठा दी जाती है। इस तरह हजारों की संख्या में श्रद्धालु भोजन स्वरूप भगवान षिवरीनारायण का प्रसाद ग्रहण करते हैं। समिति के अध्यक्ष राजेष अग्रवाल का कहना है कि दूसरे राज्यों से भी भक्त आते हैं और सुबह से ही भूखे-प्यासे वे भगवान के दर्षन करने में लीन रहते हैं। इस तरह जब वे भगवान के दर्षन प्राप्त करने कर लेते हैं तो उन्हें भोजन कराकर आत्मीय तृप्ति मिलती हैं। उनका कहना है कि ऐसा पिछले कई वर्शों से किया जा रहा है, ऐसी परिपाटी आगामी समय में कायम रखी जाएगी।बहरहाल षिवरीनाराण में लगने वाले मेले की छाप अब भी वैसा ही बरकरार है, जैसे बरसों पहले थे। मेले में आने वाली लोगों की भीड़ की संख्या में बदलते समय के साथ जितना फर्क पड़ता है, वह नजर नहीं आता। हालांकि मेले और यहां हर बरस होने वाले महोत्सव को लेकर राज्य सरकार की बेरूखी जरूर नजर आ रही है और आयोजन पर पिछले बरस से विराम लग गया है। सरकार द्वारा सहयोगात्मक रवैया अपनाया जाता है तो इस प्राचीन मेले की पहचान को आगे भी कायम रखा जा सकता है।

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ की काषी खरौद

छत्तीसगढ़, धार्मिक नगरी और पर्यटन की दृष्टि से एक समृद्धषाली राज्य है। अधिकांष इलाके वन क्षेत्रों से आच्छादित हैं और पहाड़ों के मनोरम दृष्य भी है। साथ ही प्रदेष में अनेक ऐसे धार्मिक स्थान है, जहां लोगों की आस्था उमड़ती है। ऐसा ही एक धार्मिक स्थल लक्ष्मणेष्वर धाम खरौद है, जिसे छत्तीसगढ़ की काषी के नाम से भी जाना जता है। अपनी पुरातात्विक महत्ता के कारण पुराविदों और इतिहासविदों के अध्ययन का यह नगरी हमेषा से ही केन्द्र रहा है। खरौद की एक पुरातात्विक और धार्मिक विरासत है, जिसे अब मंदिरों में बनी कलाकृति और षिलालेखों से जाना जा सकता है। पुरातन धरोहरों को समेटे मंदिरों की दीवारों व षिलालेखों पर कई ऐसे ष्लोक हैं, जिससे रामायणकालीन समय की याद ताजा हो जाती है।
जिला मुख्यालय जांजगीर से 55 किमी और बिलासपुर रेलवे जंक्षन से 65 किमी दूर बसे इस धार्मिक नगरी खरौद की पहचान तालाबों की नगरी के रूप में भी होती है। लक्ष्मणेष्वर की नगरी में 126 तालाब हैं, जिससे छत्तीसगढ़ी में बुजुर्गों द्वारा छह आगर छह कोरी कहा जाता है। खरौद में यह देखने में आता है कि जिस ओर नजरें घुमाएं, उस ओर तालाब जरूर दिखता है। साथ ही इन तालाबों के किनारे मंदिर बना हुआ दिखता है। खरौद के नामकरण को खरदूषण राजा से भी जोड़ा जाता है, वैसे पुराविद, खरौद में षैव परंपरा होने की बात कहते हैं। बदलते समय के साथ और मंदिरों का जीर्णोद्धार नहीं होने से कई मंदिर जहां खंडित हो गए हैं तो कई तालाब भी अब इतिहास बन चुके हैं। फिर भी खरौद में पुरातात्विक धरोहरों के कई अजूबे पहचान कायम है, जिसे देखने श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। खरौद में महाषिवरात्रि पर लगने वाला सबसे बड़ा मेला पूरे छत्तीसगढ़ में विख्यात है और इस दिन लक्ष्मणेष्वर धाम में भक्तों का रेला उमड़ता है। मंदिर का पट सुबह 4 बजे खुलते ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है और भगवान के दर्षन का सिलसिला देर रात तक चलता रहता है।

खरौद वैसे अनेक मंदिरों का केन्द्र है और सबकी अपनी-अपनी अलग-अलग विरासत है। नगर में स्थित भगवान लक्ष्मणेष्वर का मंदिर की महिमा अपार है और इसकी कई खासियतें हैं। 12 वीं षताब्दी में बना यह मंदिर लगभग 110 फीट चैड़ा भू-भाग में स्थित है और 30 फीट का गोलाई लिए हुआ है। महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर में स्थापित लक्ष लिंग जमीन से करीब 48 फीट उपर स्थित है। इस लक्ष लिंग में एक लाख छिद्र होना माने जाते हैं और श्रद्धालु, श्रद्धाभाव से यहां एक लाख चावल चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं। लक्षलिंग में हमेषा जल भरा रहता है और खराब भी नहीं होता, जबकि यह लक्षलिंग जमीन तल से अत्यधिक उपर है। माना जाता है कि लक्षलिंग में जो जल चढ़ाया जाता है, वह मंदिर के पिछले हिस्से में स्थित कुण्ड में चला जाता है। जिससे कुण्ड कभी सूखता नहीं है। भक्तों में आस्था है कि भगवान षिव के दर्षन मात्र से क्षय रोग दूर हो जाता है। लक्ष्मणेष्वर मंदिर के चारों ओर बड़ी दीवार बनी हुई और मंदिर के भीतर बड़ी जगह बनाई गई है, जिससे वृहदाकार निर्माण की बात पुराविद कहते हैं। मंदिर के बाहर एक कुआं स्थित है, जहां सिक्के डाले जाने की परंपरा है, यह कहा जाता है कि सिक्के के दीवार से नहीं टकराने पर षुभ होता है। भक्तों में यह भी मान्यता है कि यहां सच्चे मन से जो भी मांगा जाता है, वह पूरी होती है। इसी के चलते खरौद में महापर्व महाषिवरात्रि के अलावा सावन महीने में हर सोमवार और तेरस पर भक्तों की भीड़ देखने लायक रहती है। इन अवसरों पर दूसरे प्रदेषों से भी दर्षनार्थी भगवान लक्ष्मणेष्वर के दर्षन के लिए पहुंचते हैं। लक्ष्मणेष्वर मंदिर के अलावा खरौद में प्राचीन ईंदल देव और षबरी माता का मंदिर भी है। ईंदलदेव का मंदिर ईंट से बना है और जानकार इसे 6 वीं षताब्दी में बने होने की बात कहते हैं। ईंदलदेव मंदिर को जिले का सबसे पुरातन मंदिर माना जाता है, जिसकी दीवारों पर अनोखी कलाकृति बनाई गई है। ईंट के बने होने के कारण इतिहासविदों द्वारा हमेषा यहां षोध कार्य किया जाता है और विदेषों से भी लोग पहुंचकर यहां से जानकारी लेते हैं। पुरातत्व विभाग द्वारा प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किए जाने से मंदिर में किसी तरह निर्माण करने पर रोक है। ईंदलदेव मंदिर की जीर्ण होने की स्थिति में कुछ साल पहले पुरातत्व विभाग ने जीर्णोद्धार कराया था, इससे मंदिर को लोहे के राड से बांधा गया था। इस मंदिर की खासियत यह भी है कि इसका मुख्य द्वार पीछे की ओर और द्वार पर मां गंगे की तस्वीर उकेरी गई है। ईंदलदेव मंदिर में कई अनेक खूबियां हैं, जिसके चलते यह मंदिर पर्यटकों और पुराविदों को अपनी ओर वर्षों से आकर्षित करता आ रहा है।

षबरी मंदिर की अपनी एक पुरातात्विक पहचान अब भी कायम है। मंदिर के द्वार पर अद्धनारीष्वर की प्रतिमा स्थित है, जिसमें भगवान षिव और पार्वती की तस्वीर उकेरी गई है, जो पर्यटकों का केन्द्र बिन्दु होता है। षबरी मंदिर के कुछ हिस्से फर्षी पत्थर से बने हैं तो उपरी हिस्सा ईट से बनाया गया है। ईंट से बने होने के कारण इस मंदिर को भी देखने इतिहासविद और पुराविद पहुंचते हैं। षबरी मंदिर के षिलालेख में भी कई पुरातन ष्लोक लिखे गए हैं, जिससे खरौद नगरी के पुरातन गुणगान का पता चलता है और इन मंदिरों के दर्षनार्थ श्रद्धालु पहुंचते हैं।

फिलहाल खरौद को छत्तीसगढ़ षासन द्वारा दर्षनीय स्थल घोषित किया गया है, लेकिन जो विकास इस नगरी का होना चाहिए, वह नहीं हो सका है। मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए सामुदायिक भवन जैसी अन्य सुविधाओं की जरूरत है, मगर अब तक ऐसी कोई पहल नहीं की गई है। साथ ही नगर पंचायत द्वारा भी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया है। पुरातत्व विभाग के अधीन सभी मंदिरों के होने से निर्माण नहीं कराए जा पा रहे हैं, जबकि मंदिर में हर वर्ष चढ़ावे से लाखों रूपये की आय होती है। इस आय का अब तक कोई हिसाब नहीं रखा गया है और मंदिर की पूजा-अर्चना कार्य में लगे पुजारी ही इन राषियों को आपस में बांट लेते हैं। वैसे यहां ट्रस्ट बनाने की मांग समय-समय पर उठती रही है, किन्त यह पहल भी अधूरी है।

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

पहाड़ का सीना चीर, अनवरत बह रही धारा

छत्तीसगढ़ में पहाड़ों पर कई मंदिरों का निर्माण हुआ है और यहां बरसों से देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। पहाड़ पर विराजित डोंगरगढ़ की मां बम्लेष्वरी हो या फिर कोरबा जिले की मां मड़वारानी। यहां भक्त, विराजित देवियों के साल भर आराधना करते हैं। नवरात्रि के दौरान इन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है, जहां आस्था उमड़ती है। सैकड़ों सीढ़ियां चढ़कर भखे-प्यासे श्रद्धाभाव लेकर भक्त इन धार्मिक आस्था के केन्द्रों तक पहुंचते हैं। छत्तीसगढ़ में ऐसी अनेक मिसालें देखने को मिलती हैं, जहां की प्राकृतिक रमणीयता श्रद्धालुओं तथा दर्षनार्थियों का मन मोह लेती है और वे भक्तिभाव में रम जाते हैं।
जांजगीर-चांपा जिले के तुर्रीधाम ऐसा ही एक धार्मिक स्थल है, जहां पहाड़ का सीना चीरकर जल की धारा बरसों से अनवरत बह रही है। यह अद्भुत नजारा देखकर दर्षन के लिए पहुंचने वाले दर्षनार्थी एकबारगी दंग रह जाते हैं कि आखिर पहाड़ के भीतर से किस तरह जल की धारा बह रही है। तुर्रीधाम में हर बरस सात दिनों का मेला लगता है, जहां छत्तीसगढ़ समेत उड़ीसा से भी लोग आते हैं। सावन महीने में तो भक्तों का रेला मंदिर में देखने लायक रहता है। यहां पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु दर्षनार्थ पहुंचते हैं। जिला मुख्यालय जांजगीर से 30 किमी दूर सक्ती क्षेत्र के तुर्रीगांव में भगवान षिव का मंदिर स्थित है। यह नगरी तुर्रीधाम के नाम से विख्यात है। ऋषभतीर्थ से षुरू हुई जलधारा आगे चलकर करवाल नाले में तब्दील हो जाती है, जहां से कलकल करती धारा बहती है। इस नाले की खासियत यह भी है कि मंदिर के समीप हमेषा जल भरा रहता है और पानी की धार अनवरत बहती रहती है। इस धार्मिक नगरी में स्थित भगवान षिव मंदिर के पिछले हिस्से से जल की धारा हर समय बहती है, चाहे गर्मी हो या फिर बरसात। तुर्रीगांव के रहवासियों का तो यहां तक कहना है कि गर्मियों में पहाड़ से निकलने वाली जल की धारा और तेज हो जाती है। वह धारा मंदिर के नीचले हिस्से से होते हुए करवाल नाला में जाकर मिल जाती है, जबकि भगवान षिव का मंदिर पहाड़ से सैकड़ों फीट नीचे बना है। जानकारों का कहना है कि मंदिर में स्थापित लिंग भी नीचे है और नीचे जाने के लिए सीढ़ी का निर्माण किया गया है। इस निर्माण को भूमिज षैली का नाम दिया गया है। तुर्रीधाम में मंदिर का निर्माण जैसा हुआ है और जिस तरह से पहाड़ से जल की धारा बह रही है, कुछ ऐसी ही स्थिति मध्यप्रदेष के चित्रकोट स्थित हनुमान पहाड़ में है, जहां भूमिगत जल बहता है। यहां भी लोग यह नहीं जान पाए हैं कि पहाड़ के उपर कहां से जल की धारा बहना षुरू हुई है। वहां ऐसा जल स्त्रोत बना है, जहां हर मौसम में जल की धारा बह रही है। तुर्रीधाम में ऐसा ही नजारा हर समय देखने को मिलता है। तुर्रीधाम के ग्रामीण छत्तराम का कहना है कि पहाड़ से जल कहां से बह रहा है, वे नहीं जानते। जल की धारा पहाड़ से होते हुए करवाल नाला में जाकर मिलती है। उनका कहना है कि पहाड़ में अनेक वनौषधि रहती है। इसके चलते ग्रामीण इस जल को कीटनाषक के रूप में छिड़काव करते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात है कि पहाड़ से बह रहा जल कभी खराब नहीं होता, यह जल गंगाजल की तरह हमेषा वैसा ही रहता है। इस कारण से लोगों की श्रद्धा बढ़ती जा रही है। इस जल स्त्रोत के संबंध में किवदंति है कि तुर्रीगांव का एक चरवाहा, जानवर चराने गया था। इसी दौरान उसे भगवान षिव के दर्षन हुए। षिवजी ने उसे वर मांगने को कहा तो चरवाहा ने कहा कि मुझे धन-दौलत, सोने-चांदी, हीरे-जेवरात नहीं चाहिए, गांव में हमेषा पानी की किल्लत बनी रहती है। आप कृपया करके इस समस्या से छुटकारा दिलाइए और ऐसा कुछ कीजिए कि बारहों महीने यहां जल उपलब्ध रहे। गांव के बुजुर्गों के अनुसार तब से तुर्रीधाम में चट्टान से पानी अनवरत बह रहा है और गांव में कभी भी पानी की दिक्कतें नहीं हुई है। भीषण गर्मी में भी कोई परेषानी सामने नहीं आती। उस चरवाहे के वंषज अब भी गांव में निवास करते हैं। समय के बदलते चक्र के साथ यहां मंदिरों का निर्माण होता चला गया और यह एक धाम के रूप में स्थापित हो गया। पुरातत्व के जानकार एवं जिला पुरातत्व समिति के सदस्य प्रो। अष्विनी केषरवानी का कहना है कि तुर्रीधाम, करवाला नाला के तट पर बसा है, जहां श्रद्धालु भगवान षिव के दर्षन के लिए आते हैं। हर वर्ष लगने वाले मेले में लोगों की भीड़ उमड़ती है। अनेक विषेषताओं के कारण तुर्रीधाम के प्रति लोगों की आस्था दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। मंदिर के उपर तट पर स्थित पहाड़ से अनवरत जल की धारा बरसों से बह रही है, जो रमणीय है और षोध का विषय है कि आखिर ऐसा क्यों और किस कारण से हो रहा है। गर्मी के दिनों में धारा और तेज होने को लेकर भी पुरातत्व के जानकारों को कार्य किए जाने की जरूरत बनी हुई है।

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

हरियाली की रखवाली मां के हाथ में

जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम पहरिया के पहाड़ में मां अन्नधरी दाई विराजित हैं। करीब 30 एकड़ क्षेत्र में फैल इस पहाड़ में हजारों इमारती पेड़ है, जिसे लोगों के द्वारा नहीं काटा जाता। पहाड़ में लकड़ियां पड़ी रहती हैं और दीमक का निवाला बनती है, मगर लकड़ियों को उपयोग के लिए कोई नहीं ले जाता। यह भी लोगों के बीच धारणा है कि जो भी मां अन्नधरी दाई के पहाड़ पर स्थित इमारती लकड़ी को घर लेकर गया, उस पर मां की कृपा नहीं होती और उस पर दुखों का पहाड़ टूट जाता है। उसे और उसके परिवार पर आफत आ जाती है। यही कारण है कि पहाड़ पर लकड़ियां सड़ती-गलती रह जाती हैं, लेकिन उसे कोई हाथ नहीं लगाता। इस तरह मां ही हरियाली की रखवाली करती हैं और यह पर्यावरण संरक्षण की दिषा में सार्थक पहल हो रही है। साथ ही इससे समाज में भी संदेष जाता है, क्योंकि आज की स्थिति में जिस तरह जंगल काटे जा रहे हैं, वहीं पहरिया में जो लोगों के मन भावना है, उससे निष्चित ही पर्यावरण संरक्षण की दिषा में कार्य जरूर हो रहा है। जिला मुख्यालय जांजगीर से 20 किमी तथा बलौदा विकासखंड से ग्राम पहरिया की दूरी करीब 10 किमी है। पहरिया, चारों ओर से पहाड़ों और हरियाली से घिरा हुआ है, लेकिन मां अन्नधरी दाई जिस पहाड़ में स्थित है, वह जमीन तल से काफी उपर है। करीब 100 फीट उपर पहाड़ पर हजारों की संख्या में छोटे-बड़े इमारती पेड़ हैं, जिससे हरियाली तो फैली हुई है। साथ ही पेड़ों की कटाई नहीं होने से पर्यावरण संरक्षण में यह सार्थक साबित हो रहा है। यही कारण है कि पहरिया समेत इलाके के लोगों में मां अन्नधरी दाई के प्रति असीम श्रद्धा है और साल के दोनों नवरात्रि में यहां ज्योति कलष प्रज्जवलित भक्तों द्वारा कराए जाते हैं। इसके अलावा मां की महिमा के बखान सुनकर दूर-दूर से लोग पहाड़ीवाली मां अन्नधरी दाई के दर्षन के लिए पहुंचते हैं। ग्राम पहरिया के दरोगा राम का कहना है कि लोगों में मां के प्रति आस्था की जो भावना है और पेड़ों के संरक्षण के प्रति जो लोगों में जागरूकता बरसों से कायम है, वह निष्चित ही समाज के अन्य लोगों के लिए एक अच्छा संदेष ही माना जा सकता है, क्योंकि जहां जंगल दिनों-दि कट रहे हैं और पर्यावरण के हालात बिगड़ रहे हैं, वहीं ग्राम पहरिया में मां अन्नधरी की महिमा की खाति जो परिपाटी चल रही है, वह काबिले तारीफ है और इसे अन्य लोगों को भी आत्मसात करने की जरूरत है। यदि इस तरह पहल अन्य जगहों में होने लगे तो वह दिन दूर नहीं, जब पेड़ों की अंधा-धुंध कटाई में कमी जरूर आ जाएगी। अंत में मां अन्नधरी दाई को प्रणाम और लोगों की आस्था को सलाम। निष्चित ही यह समाज के लिए प्रेरणादायी अवसर है।

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

नैला में विराजीं धन दुर्गा

जिला मुख्यालय जांजगीर से लगे नैला के रेलवे स्टेशन के पास श्री-श्री दुर्गा उत्सव समिति द्वारा विराजित की गई दुर्गा की प्रतिमा को देखने लोगों की भीड़ जुट रही है। मूर्ति की खासियत यह है की नव दुर्गा की प्रतिमा में २१ हजार चांदी के सिक्के जड़े गए हैं। इस मूर्ति की अनुमानित कीमत ८० से ९० लाख बताई जा रही है। नवरात्री के छठवें दिन शाम को जब दुर्गा को अद्भुत प्रतिमा स्थापित की गई, उसके बाद नैला स्टेशन के पास लोगों की सुबह से देर रात तक भीड़ लगी रही। समिति के सदस्यों ने बताया की संभवतः इस तरह की प्रतिमा अन्य राज्यों में माँ दुर्गा की प्रतिमा विराजित नहीं की गई है। छत्तीसगढ़ में तो ऐसी अद्भुत प्रतिमा और धन दुर्गा पहली बार विराजित हुई हैं।
समिति द्वारा पिछले साल १०-१० रूपये के सिक्के जड़कर माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाई गई थी। इस दौरान भी लोगों की आस्था उमड़ी थी। उससे पहले समिति के सदस्यों ने शिप और नारियल की प्रतिमा बनवाई थी। उसे भी लोगों ने खूब पसंद किया था। इन प्रतिमाओं को कोरबा के कलाकार गोरे स्वर आकृति दी जाती है। इस साल भी बनाई गई २१ हजार चंडी के सिक्के की प्रतिमा को उन्हीं ने ही आकृति दी है।
नवरात्री के तीन दिनों तक हजारों लोगों ने चांदी के सिक्के से बनी प्रतिमा को देखने पहिंचे और सभी होते नजर आये।
सभी पर माँ दुर्गा की कृपा बनी रहे। इसी आशा के साथ
आदि शक्ति माता को प्रणाम।